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भोर के बाद भी

                
                                                         
                            भोर के बाद भी
                                                                 
                            

भोर की सुनहरी पगडंडी पर
आज फिर अकेली चली हूँ—
ओस में भीगी घास
मेरे कदमों से पूछती रही,
कहाँ जाना है?

मैंने कुछ नहीं कहा।

रास्ते के किनारे
हरसिंगार झर रहा था,
सफेद पंखुड़ियाँ
मिट्टी पर ऐसे बिखरी थीं
जैसे रात ने
अपने कुछ अधूरे सपने
धरती को सौंप दिए हों।

हवा में घुली थी
फूलों की हल्की सुगंधी,
और उस सुगंध में
अचानक तुम्हारी याद आ गई।

अजीब है न—
कुछ लोग चले जाते हैं,
लेकिन उनकी उपस्थिति
हमारे भीतर से
कभी नहीं जाती।

उस सुबह सब कुछ
बहुत सुखद था—
न कोई शोर,
न कोई शिकायत,
न किसी से कोई अपेक्षा।

सिर्फ़ मैं थी
और मेरे भीतर
धीरे-धीरे शांत होता
एक पुराना तूफ़ान।

कभी लगता था
तुम पर मेरा अधिकार है,
तुम्हारी चुप्पी पर,
तुम्हारी मुस्कान पर,
तुम्हारी लौटती हुई आहट पर भी।

फिर समझ आया—
प्रेम अधिकार नहीं,
एक ऐसी अनुभूति है
जिसे बाँधा नहीं जा सकता।

कुछ रिश्ते
हमारे साथ रहने के लिए नहीं,
हमें बदल देने के लिए आते हैं।

अब बहुत कुछ पीछे छूट गया है,
और बहुत कुछ अभी बाकी भी है।

बाकी है—
अपने लिए मुस्कुराना,
बिना किसी वजह के खुश होना,
किसी सुबह
खुद से फिर मिलना।

आज उसी पगडंडी पर
मैंने पहली बार महसूस किया—
तुम्हें भूलना ज़रूरी नहीं है,
तुम्हारी याद के साथ
आगे बढ़ना ज़रूरी है।

पीछे मुड़कर देखा—
हरसिंगार अब भी झर रहा था।

लेकिन इस बार
मैंने उन पंखुड़ियों को
उठाया नहीं।

उन्हें वहीं रहने दिया।

क्योंकि कुछ चीज़ें
सुंदर इसलिए होती हैं
कि वे हमारे पास नहीं रहतीं—
वे बस
हमारी स्मृति में
महकती रहती हैं।

 
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एक घंटा पहले

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