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देखा किसने मुझे हर बार ही संभलते हुए

                
                                                         
                            होंठ सिलते हुए कभी तो हाथ मलते हुए
                                                                 
                            
इक जमी बर्फ को देखा है हमने जलते हुए
कैसे अरमानों की होलिका जलते देखा
हमने देखा भी था अरमान दिल में पलते हुए
लौ में जलकर मरकर इतना अफसोस रहा
देखा परवानों ने शम्मा नहीं पिघलते हुए
कब गिरा,कैसे गिरा मैं है जमाने को खबर
देखा किसने मुझे हर बार ही संभलते हुए
आज हमने अजब सी चीज कोई देखी है
रात के कोख से सूरज कोई निकलते हुए
वो गया तो मुझे अफसोस यूं ज्यादा न हुआ
ख्वाब में देखा मगर खुद को दिल मसलते हुए
चंद लम्हों की रंगीनियों के बाद क्या होगा
सोचकर आ गया घर अपने मैं दिन ढलते हुए
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9 घंटे पहले

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