मैं चाह कर जरा भी संगदिल नहीं होता
फूलों की ओर देखूं मुनासिब नहीं होता
कितने दिनों से दिल भी मेरा मुझसे खफा है
कुल दिन हुए ये मुझसे मुताखिब नहीं होता
गर्दिश जमाने भर की हँसा करती है मुझपर
कुछ जिंदगी में मेरे मुताबिक नहीं होता
कुछ तो नहीं होता है कुछ भी करने से मेरे
जो होता भी है,वो किसी काबिल नहीं होता
ख्वाबों को अब सूरत कोई देकर है देखना
कोशिश करे इंसां तो क्या हासिल नहीं होता
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