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जेहन में ईल्म का हम आफताब रखते हैं

                
                                                         
                            हम कहां आज भी सही हिसाब रखते हैं
                                                                 
                            
कांटे मुट्ठी में हाथ पर गुलाब रखते हैं
मेरी शराफत को सुनकर तो चले आए हो
हम सिर्फ तुम पर नीयत खराब रखते हैं
साबका मेरा रोज पड़ता है ऐसे लोगों से
बाहर गंगाजल अंदर शराब रखते हैं
जरा भी अंधेरों से डर हमें नहीं लगता
जेहन में ईल्म का हम आफताब रखते हैं
कथनी और करनी क्या एक आपकी होगी
आप दो पाँवों में भी जुदा जुराब रखते हैं
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एक घंटा पहले

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