वक्त के हाथों कभी,तो दुलारे जाएंगे
हम चले जाएंगे, तो पुकारे जाएंगे
कितनी नजरों में चढ़े,जब बुलंदियों पे चढ़े
जब यह से गिर जाएंगे, उतारे जाएंगे
तुम भी महफूज न रहोगे शहर जलने पर
जंग जब होगी तो,शहरी भी मारे जाएंगे
कत्लगाह ये जमीं है अगर परिन्दों की
चार दाने गर बिखेर दोगे, चहचहाएंगे
हम भलाई कर,जिनके दिलों में कैद हुए
करके गुनाह फिर,कोई, निकाले जाएंगे
आँखें चौंधियाने की, भी शिकायतें होंगी
आँखें मूँद लेने से ,क्या उजाले जाएंगे
चांद देखती है भी,इंतजार कर दुनिया
मगर ये सितारे टूटकर,निहारे जाएंगे
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