हर बेताबी बहुत बुरी थी
कितनी नजरें झुकी हुई थीं
धुआं जहां से उठते दिखा
आग वहीं पर लगी हुई थी
हर धड़कन तूफान बनी थी
साँसें जैसे थमी थमी थीं
अपने मन के खलल थे सारे
कहीं तो कोई कमी नहीं थी
देखो अब तूफान थमा है
चीजें क्या पहले ऐसी थीं
हम खुद को पहचान न पाए
यूं जीने की होड़ लगी थी
जख्म मिले शायद भर पाएं
तब कोई दुनिया उजड़ी थी
दूर से मैं सब देख रहा था
कितनी वारदात हुई थी
फूल,समंदर,खुशबू, शबनम
और भी चीजें कुछ अच्छी थीं
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