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सोपान

                
                                                         
                            मन पीड़ित है मेरा लेकिन,
                                                                 
                            
किससे जाकर बतलाऊँ।
अच्छा होगा मंदिर जाकर,
ध्यान लगा मन बहलाऊँ।।

सुना दूँ भगवन को सारे दुख,
पड़ा है मन पर बोझ हटाऊँ।
नयनों के निर्मल जल से ही,
मैं हरिहर को अर्घ्य चढ़ाऊँ।।

कंटक पथ ऊँचे *सोपान* हैं,
बेशक चलकर थक जाऊँ।
मैं बालक छोटा अज्ञानी,
भगवन तुम्हरा दर्शन पाऊँ।।

अद्भुत ज्योति जगे पावन,
लखूँ हृदय का तमस मिटाऊँ।
अहा!हरी के चरण कमल लखि,
जनम-जनम के पाप नशाऊँ।।
-पंडित अनिल
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3 घंटे पहले

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