साबरमती की रेतों पर जब
सत्य-शंख की ध्वनि गूँजी,
अंधी रात के माथे पर तब
भोर नई आकर थी पूँजी।
एक अकेला चला मगर वह
जन-जन का विश्वास बना,
नफरत के तपते जंगल में
प्रेम स्वयं मधुमास बना।
गांधी केवल नाम नहीं थे,
वे अंतर का उजियारा थे,
झूठ-सियासत के कोहरे में
सत्य स्वयं ध्रुवतारा थे।
पत्थर जैसे समय हृदय पर
करुणा की जलधार बही,
हिंसा के ऊँचे पर्वत पर
अहिंसा निर्भय खड़ी रही।
शास्त्री जैसे खेत की मेड़ें—
सादा, शांत, अडिग, अकेली,
पर संकट की आँधी आए तो
बन जातीं चट्टान सहेली।
माटी से उठती सौंधी गंध में
उनके संकल्प नाद हुआ ,
सीमा पर प्रहरी की आँखों में
भारत का गौरव अडिग दिखा।
एक ने मन को जीत सिखाया,
दूजे ने श्रम का मान बढ़ाया,
एक ने घावों पर मरहम रखा,
दूजे ने साहस दीप जलाया।
दोनों के जीवन की गाथा
वैभव से अनजान रही,
भारत माँ के चरणों में बस
निष्काम समर्पण की रही।
जब-जब मूल्य धुंधले होंगे,
जब-जब पथ अनजान मिलेगा,
गांधी का सत्य दीप बनकर
मन के भीतर राह दिखाएगा।
शास्त्री का श्रम-स्वेद पुकारे—
“माटी का सम्मान करो”,
दोनों के पदचिह्नों पर चलकर
भारत का निर्माण करो।
-पंडित अनिल
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