जिन हाथों ने घर को सँवारा,
जिनसे जगमग हुआ उजियारा,
हँसते हुए चेहरे गीले हो गए ,
लोग बूढ़े ही नहीं, बूढ़े अकेले हो गए।
जिन आँखों में सपने पलते,
जिनसे घर के दीपक जलते,
आज वही नयनों में ढलते,
साँझ के साए जैसे गहरे हो गए।
बच्चे अपनी दुनिया में खोए,
अपने सुख में दिन-रैन सँजोए,
माँ-बाप चुप बैठे-बैठे रोए,
पास थे फिर दूर कितने हो गए।
सूनी चौखट, सूना आँगन,
सूना मन और सूना दर्पण,
यादों में बसता बीता जीवन,
हँसते घर भी कितने सूने हो गए।
फिर भी होंठ दुआएँ देते,
अपने दर्द किसी से न कहते,
बच्चों के सुख में सुख ही लेते,
खुद टूटे,पर उनके लिए पूरे हो गए।
लोग बूढ़े ही नहीं बूढ़े अकेले हो गए,
रिश्ते जीवित रहे, बस रिश्ते अधूरे हो गए।
-पंडित अनिल
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