नदी किनारे बैठा हूँ,
अंजलि में जल भरता हूँ।
तुमको देने जल आया,
खुद से मिलने लगता हूँ।
सूना आँगन, सूनी देहरी,
सूना घर का द्वार।
तुम बिन जैसे रूठ गया हो
घर का सारा प्यार।
बंद संदूक, पुरानी चिट्ठी,
मुट्ठी भर संसार।
छूते ही फिर खुल जाता है
बीता हर त्योहार।
कितनी बातें कहनी थीं,
कितना था सुनना।
तुम तो चुपचाप चले गए,
रह गया बस कहना।
तुमने उँगली थाम सिखाया
जीवन का व्यवहार।
आज तुम्हारी छाँह न पाकर
मन है बे-आधार।
आज तर्पण में जल थोड़ा,
आँसू अधिक उतर आए।
रिदम तुम्हारा है साँसों में,
दीप अहर्निश जलता जाए?
ऋतुएँ आएँ, ऋतुएँ जाएँ,
बदले जग के रंग।
तुम्हारी दी स्मृतियाँ लेकिन
चलती मेरे संग।
हर बरस इस तट पर आकर
अंजलि फिर भर दूँगा।
तुम लौटोगे नहीं—जानूँ,
फिर भी तुम्हें पुकारूँगा।
जल में अर्पित आज तुम्हें है
मेरे लोचन -नीर,
तुम बिन जीवन चलता है, पर
तुम बिन जीवन पीर।
नदी बहेगी, ऋतु बदलेंगी,
आँगन फिर से भर जाएगा,
पर जिस रिक्ति को तुम छोड़ गए—
वह कौन कभी भर पाएगा?
जब तक घर की नींव में साँसें,
जब तक मन में धड़कन होगी,
तुम्हारी स्मृति की धीमी लौ
मेरी हर पीढ़ी में रोशन होगी।
हे पितरों! स्वीकार करो यह
नयनों का मौन समर्पण,
जल की धारा के संग बहता
जीवन भर का यह तर्पण।
-पंडित अनिल
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