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योग शील- दोहा मुक्तक

                
                                                         
                            मेरे मन में आ रहा, टेढ़ा एक सवाल।
                                                                 
                            
रोग दूर हो योग से, योग दवा का काल।
फिर बाबा क्यों बनाता, भांति भांति के भस्म?
आयुर्वेदिक दवा का, क्या होगा तब हाल?।

हो सुयोग तबही मिले, रोटी दाल अचार।
झोला लेकर जा रहा, सब्जी को बाजार।
झाड़ू, पोछा, बर्तनों से मिलती नहि मुक्ति।
पत्नी भुन-भुन भ्रामरी, कर अनुलोम प्रहार।।

यौगिक पर प्रेक्टिकल में, बड़ा हुआ ब्यापार,
चूना, चीनी ,यूरिया, चाक, तूतिया यार।।
ढूंढ़ ढूंढ़ कर थक गया, मिला न यौगिक एक।
लैब सहायक को दिया, तब रुपये दो चार।।
यौगिक= रासायनिक कंपाउंड
-आनंद कुमार मिश्र
स्वरचित।सर्वाधिकार सुरक्षित।


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7 वर्ष पहले

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