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ये कब हम ने सीख लिया

                
                                                         
                            अपनी हक़ीक़त ख़ुद से छुपाना ये कब हम ने सीख लिया
                                                                 
                            
अपने ही सच को झुठलाना ये कब हम ने सीख लिया

हमें तो बहुत नाज़ था अपनी सच शफ़्फ़ाफ़ सदाक़त पर
इधर-उधर की बात बनाना ये कब हम ने सीख लिया

तुम कहते थे हँसकर मुझ से कि तुम सचमुच झूठे हो
इसी झूठ से जी बहलाना ये कब हम ने सीख लिया

मुझे जहां ने अच्छा समझा मुझे लगा यूँ ही होगा
परख के ख़ुद ना ख़ुद को बताना ये कब हम ने सीख लिया

मुझे बनाने वाले तू तो रग-रग से वाक़िफ़ है मेरी
तेरी निगहबानी को भुलाना ये कब हम ने सीख लिया

कहते हैं कि सोहबत-संगत ही किरदार बनाती है
हरदम हाज़िर तुम को न जाना ये कब हम ने सीख लिया

जो भी सीखा रब के बाहर या रब वो भुलवा दे तू
‘अंजुम’ फिर ना पड़े दोहराना ये कब हम ने सीख लिया

 
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40 मिनट पहले

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