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शून्य से विवेकानंद तक

                
                                                         
                            झूठे वादों को आज
                                                                 
                            
खुली ललकार है,
मत कहना यह महज़
कोई मज़ाक या इंकार है।
तुम भी वाकिफ़ हो सच से,
हम भी जानते हैं,
जो कर रहा है वादे,
वही असल में
चोर-ए-बाज़ार है।
जो निंदा में मसरूफ़ है,
वो खुद निंदनीय होता है,
खिलौना छिन जाने पर
बस मासूम बच्चा ही रोता है।
अब सोच-समझकर कदम बढ़ाओ,
ऐ मेरे देशवासियो,
पाने वाला ही पाता यहाँ,
और खोने वाला बस खोता है।
यह कोई विधि का विधान नहीं,
इंसान का ही फ़रमान है,
जितना जानोगे इस तंत्र को,
लगेगा उतना ही नादान है।
गरीब की थाली को झूठे वादों के
दिलासे नहीं चाहिए,
भूख से निपटारा पहले,
फिर शिक्षा का भविष्य सुनहरा चाहिए।
जो पढ़ा गए हो अब तक,
या जो आज पढ़ा रहे हो,
वो इतिहास नहीं,
बस एक सोची-समझी
साज़िश और धोखा है।
तुम भी जानते हो कि
इस वतन की पाक मिट्टी में,
हर आने वाला कदम
तरक़्क़ी का एक नया मौक़ा है।
पर तुम चाहते ही कहाँ हो कि
यह मौक़ा हर हाथ को मिले,
चाहते हो बस तुम ही चट कर जाओ,
ये चमन कभी न खिले।
मासूम जनता तो आज भी
इतनी भोली और बावरी है,
दो जून की रोटी भी मिल जाए,
तो तुम्हारे ही तराने गाए।
एक दौर था जब नेता
इस देश की जनता का अभिमान थे,
सरहद पर जवान और
खेतों में डटे किसान ही
देश की शान थे।
तब जाकर बनता था
इस महान राष्ट्र का सच्चा स्वाभिमान,
आज कहाँ खो गए वो रहनुमा,
कहाँ गया वो हिंदुस्तान?
अब तो हर तरफ़ स्वार्थ के ही
पहरे दिखाई देते हैं,
सियासत की भट्टी में इंसानियत को
झोंकते दिखाई देते हैं।
जो आज ख़ामोश हैं,
वो भी कल इस आग में
झुलस जाएँगे,
आने वाली नस्लों में
फिर वही अत्याचारी पुरखे लहराएँगे।
याद रखो जो आज
अन्याय को देखकर भी मौन है,
वो शून्य है,पर उस शून्य के भीतर छिपे
महासागर को जाना किसने है?
जो जान गया इस मौन की ताक़त
और शून्य का विस्तार,
वही विवेकानंद बनकर रच देता है
एक नया इतिहास हर बार!
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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