"जो मुस्कुराता रहा..."
सीने में एक शोर था,
मगर होंठों पर ख़ामोशी थी,
आँखों में सैलाब ठहरा था,
फिर भी चेहरे पर
एक अजीब-सी रोशनी थी।
लोग समझते रहे
शायद इसे दर्द छूता ही नहीं,
शायद इसे गिरने का डर नहीं…
उन्हें क्या मालूम,
हमने गिरकर ही
अपने भीतर की ज़मीन पहचानी है।
कई रातें ऐसी थीं
जब नींद दरवाज़े तक आई,
मगर लौट गई
क्योंकि सिरहाने रखे सवाल
बहुत ज़्यादा थे।
कई बार लगा
कि अब और नहीं…
फिर भीतर से किसी ने कहा
“चल… अभी रास्ता ख़त्म नहीं हुआ।”
हमने उस आवाज़ को
नाम नहीं दिया,
बस राम कहकर
दिल में बसा लिया।
ज़िंदगी ने
एक-एक करके बहुत कुछ छीना,
हमने भी हर कमी को
एक सीख की तरह रख लिया।
जो पत्थर रास्ते में मिले,
उन्हीं से हौसले की सीढ़ियाँ बना लीं,
जो आँसू आँखों से निकले,
उन्हीं से भीतर की धूल धो ली।
अब कोई पूछता है
“इतना सहकर भी
तुम मुस्कुराते कैसे हो?”
हम कहते हैं
मुस्कान इसलिए नहीं
कि दर्द कम है,
मुस्कान इसलिए है
कि दर्द से बड़ा
हमारा विश्वास है।
हमने जाना है
हर टूटना अंत नहीं होता,
कुछ दरारों से
रौशनी भी उतरती है।
हर ख़ामोशी कमजोरी नहीं होती,
कुछ मौन
प्रार्थना बन जाते हैं।
और हर तूफ़ान
घर उजाड़ने नहीं आता,
कुछ तूफ़ान
इंसान को
उसकी असली पहचान देने आते हैं।
आज भी दिल में
बहुत कुछ अनकहा है,
आज भी आँखों में
कुछ मौसम ठहरे हैं…
मगर अब शिकायत नहीं।
क्योंकि हमने सीख लिया है
"जिसे दुनिया दर्द समझकर छोड़ देती है,
वही दर्द कभी-कभी
इंसान को उसके भीतर के
ईश्वर तक पहुँचा देता है।"
इसलिए मैं चलता रहूँगा…
धीरे सही,
थका हुआ सही,
ख़ामोश सही
मगर रुकूँगा नहीं।
क्योंकि मेरी कहानी
मेरे दर्द से नहीं,
"उस विश्वास से लिखी जाएगी
जिसने मुझे दर्द के बावजूद
मुस्कुराना सिखाया।"
-आचार्य अमित
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