तुम बाज़ार के भाव की तरह
हर रोज़ महँगे होते जा रहे हो,
और सच कहूँ
मेरी हैसियत, मेरी चाहत,
मेरे हर _अख़्तियार_ से
बाहर होते जा रहे हो।
तुम्हें सुना जा सकता है,
सियासत के उन भाषणों की तरह,
जो कानों तक तो पहुँचते हैं,
मगर दिल तक नहीं उतरते।
तुम्हें महसूस किया जा सकता है
किसी अभिनेता की आँखों में ठहरी
उस वेदना की तरह,
जो परदे पर दिखती तो है,
मगर भीतर कहीं
सचमुच रुला जाती है।
तुम्हें कुरेदा भी जा सकता है
उन सूनी और ख़ाली खाइयों की तरह,
जिनमें कभी उम्मीदें दफ़्न थीं,
मगर अब उनका
कोई औचित्य नहीं रहा।
फिर भी…
तुम कहीं न कहीं
अपना _असर_ रखते हो।
कभी एक ख़ामोश एहसास बनकर,
कभी अधूरी-सी प्यास बनकर,
कभी आँखों में ठहरी नमी बनकर,
तो कभी साँसों में बसी
एक अनकही आस बनकर।
यह अलग बात है
कि तुम्हें पाने की राह
मेरी पहुँच से दूर होती जा रही है,
मगर तुम्हारा असर—
हर रोज़
मेरे और क़रीब होता जा रहा है।
दिल से पूछूँ तो
धड़कनों में तुम ही हो,
दिमाग़ से पूछूँ तो
ख़यालों में तुम ही हो,
ख़ामोशी से पूछूँ तो
उसकी आवाज़ में तुम ही हो,
और मेरी हर दुआ के आख़िरी लफ़्ज़ में भी
बस… तुम ही हो।
तुम्हें भुलाना शायद
मेरे बस में कभी था ही नहीं,
क्योंकि कुछ लोग
ज़िंदगी में नहीं रहते
वे ज़िंदगी पर
असर रखते हैं।
और तुम…
मेरे दिल और दिमाग़ में ही नहीं,
मेरी रूह के हर कोने में
अपना असर रखते हो।
-आचार्य अमित
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