जब हर दिशा में दर्पणों का
एक अनंत विस्तार हो,
और स्वयं को मापने का
हर घड़ी व्यापार हो।
जब सफलता के नाम पर
मन का चैन गिरवी पड़े,
और मुस्कानों के नगर में
आँखें चुपचाप नम खड़े।
जब समाचारों की आँधी में
सत्य का दीपक डोलता,
और अपने ही अंतर्मन से
मनुष्य मिलना भूलता।
जब मतभेदों की दीवारें
घर-आँगन तक आ पहुँचें,
और संबंधों के वृक्ष सूखकर
शब्दों भर में सिमटें।
तब भी रखना धैर्य जीवित,
तब भी रखना नेह साथ,
जीत वही जो बाँट सके
अपने हिस्से की भी बात।
हर युग अपनी अग्नि लाता,
हर युग का संघर्ष नया,
पर मानव के साहस का
स्रोत रहा है एक ही दिया।
न ऊँचाई अंतिम मंज़िल,
न ताली ही पहचान है,
जो गिरकर भी उठता जाए,
वही सच्चा इंसान है।
चलो कि राहें पूछ रही हैं,
कितना है विश्वास शेष,
चलो कि भविष्य देख रहा है,
आज तुम्हारा कर्म-विशेष।
पग-पग तपना भाग्य हमारा,
पग-पग खिलना भी साथ,
युग बदले, साधन बदलें,
न बदले मनुष्य का पथ—
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ।
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