सबकी एक किताब है
और सब में हम एक किरदार हैं।
किताब के हर एक पन्ने पे
हम सबका एक नाम है।
हर पन्ने पे एक कहानी है
जो हर किसी की एक कहानी है।
हम सबको हम खास लगे
जो लोग हमारे थे, उस वक्त पास लगे।
शायद इतने पास थे
कि न मिलने की कुछ आस थी।
अब दूर-दराज़ों में
रस्ता निहारे हम सभी।
उन किताबों में हर किरदार को
मैंने खुद में लिखाया है,
हर किसी की कहानी को
कुछ मैंने अपना जैसा ही बनाया है।
जब-जब मैंने किताब खोली
तब-तब मैंने यह पाया
कि हर उस किरदार के
साथ मुझे अपना एक किस्सा याद आया।
किस्से-कहानियां बहुत सुनी हैं
कितने किरदार मैंने जिए हैं,
मैं न जाने किस किताब का हिस्सा हूं
मैं न जाने किस किरदार का हिस्सा हूं।
उन किताबों को अब पढ़ने का
मन काफी करता है
पर न जाने क्यों
यह वक्त नहीं थमता है।
किसी दूर-दराज़ में बैठकर
मैंने वापस उस किताब को खोला था,
खुद को इतना अकेला पाया था
और फिर मैं रात भर रोया था।
हमें लगा हम हैं इस किताब के मुख्य अतिथि,
मुख्य कलाकार,
पर यह किसी को नहीं पता था
कि हम सिर्फ एक छोटे से किरदार,
बाकी मुख्य किरदार तो कई सारे किरदार थे।
उम्र के इस पड़ाव पे
मैं खुद को इतना समझाता हूं
कि अब जितनी भी किताबें लिखनी हैं
उनमें मैं कभी खुद को मुख्य किरदार नहीं बनाता हूं।
अब किताबें लिखना बंद करता हूं
और सिर्फ खुद को पढ़ता हूं... खुद को पढ़ता हूं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X