कह रहा था कल कि उसका सारा जहाँ है
कहीं भी नहीं आज उसका नामो निशां है
कह ना सका है अगर वो जुबान से
उस आदमी की आंख में सब साफ बयां है
हर बात पर ही लोग उसका नाम ले रहे
कह रहे बसर खुदा की आसमाँ है
आये अनगिनत यहाँ और चल बसे
आने जाने से किसी के फरक कहाँ है
सोचते आलोक कि प्रानों के निकलते
लोग यह कहेंगे कि मिट्टी का मकां है
-आलोक
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