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मेरे अल्फाज़

जब पाकिस्तान ही नहीं रहेगा

alok mallick

5 कविताएं

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जब पाकिस्तान ही नहीं रहेगा

चाह नहीं दिल्ली के दिल में इस्लामाबाद हो
भारत की ध्वज तले पाकिस्तान आबाद हो

इसलिए हे पाक मैं तुम्हें समझाता हूँ
अंतिम सत्य है जो उसे बतलाता हूँ

राह तुमने जो आतंकवाद वाला पकड़ा है
उसमें बहुत ही ज्यादा लफड़ा है

लौट आओ तुम शांति की राहों पर
वरना रोना होगा असंख्य कटी हुई भुजाओं पर

कारगिल में तुमने कायर बन पीठ दिखाया था
इकहत्तर में तुझसे आत्मसमर्पण करवाया था

हर बार तुम मुंह की खाईं हो
और कितनी बार तेरी जग हसाई हो

हमें उकसाकर हमसे नरमी की आशा मत करना
वरना पड़ जायेगा तुमको घुटनों के बल चलना

मन में अब क्षमा नाम का शमा न होगी
अबकी बार हमारी आंखों में दया न होगी

गरजेंगे जब भारत माँ के वीर
फट जायेंगे तेरे पिट्ठुओं के चीर

आर-पार का अब यह संग्राम होगा
न ही कोई संधि न युद्ध विराम होगा

न जाने किस दुनियाँ में तुम रहते हो
सत्य को जानकर भी नासमझ बनते हो

नरता से रहित कृत्य सदा तुमने किया है
हर क्षण हर पल हमें धोखा दिया है

इस्लाम का नाम तुम यूं ही बदनाम ना कर
इंसान को इंसान रहने दें हैवान न कर

हुआ युद्ध तो तू बहुत बलहीन होगा
सम्पूर्ण धरा पर तू सबसे दीन होगा

अरे याद है ना तुम्हें बंग्लादेश
इस बार बनेगा बलूच एक स्वतंत्र प्रदेश

हर जख्म का हम बदला लेंगे
हर आतंक पसंद को हम दहला देंगे

गद्दारों के टोली के जितने भी सरदार हैं
उनका भी अंतिम इच्छा जानने को हम तैयार हैं

देश के दुश्मनों पर चुन-चुन कर प्रहार होगा
चाहे गीदड़ हो या भेड़िया सबका शिकार होगा

इस बार रणनीति व्यापक होगी
बीच में न कोई शियासत होगी

चीन को हमने समझाया है
डोकलाम में सही पाठ पढ़ाया है

तेरे पास न अमरीका है
और न अरब अफ्रीका है

दुनियाँ आज भारत का कायल है
आतंकवादियों से वह भी तो घायल है

जाग चुके हैं हम सिंह समान
भारत था है और रहेगा महान

किस बात पर तुम इतना इतराते हो
अपनी करनी पर क्यों नहीं पछताते हो

अबकी बार एक भी दहशतगर्द नहीं बचेगा
कैसे बोल जब पाकिस्तान हीं नहीं रहेगा

इसबार ऐसा सबक सिखाउंगा
अमृत खुद पीकर विष तुम्हें थमाऊंगा

तेरे पांवों तले अंगार ही अंगार होगा
जिसपर चलने हेतु तू विवश और लाचार होगा

तेरा किया-धरा यह सब पाप होगा
आने वाली नस्लों के लिए यह अभिशाप होगा

अंतिम अवसर उन्नति का तेरे पास है
धरा को तेरी प्रगति की प्यास है

टेक घुटने छोड़ कश्मीर की राग
मत खेल तुम हमसे लहू का फाग

हाथों में पत्थर नहीं कलम थमा
धरा पर तू शांति के बीज जमा

अच्छा करोगे अच्छा फल मिलेगा
पीने को भी सिन्धु जल मिलेगा

वरना उत्तर कोरिया की तरह मिमयाओगे
इराक़ और सिरिया की तरह पछताओगे

अभी भी वक्त है सुधर जाओ तुम
अंधेरे कुएं में गिरने से बच जाओ तुम

वरना ऐसा रक्तरंजित तेरा शरीर होगा
कभी न भरने वाला घाव गंभीर होगा
आलोक अररिया

#AzadAlfaz

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