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कभी यूं ही -तुम मिल जाओ सरे राह

                
                                                         
                            यूं ही कभी हम सेहरा
                                                                 
                            
कभी बरसात होते हैं

आप मुस्कुराए तो रौशन
वरना घनेरी रात होते हैं

यूं ही उठाया हाथ आपने
यूं ही फिर छोड़ दिया

यूं ही खेल खेल में आपने
अनजाने ही दिल जोड़ लिया

कभी यूं ही
आप जो मिल जाए सरेराह
बांट लूं आपसे अपने मन की हर चाह

ना हो बंदिशें कोई वक़्त की, ना ख़्वाहिशों की,
मान की, ना अपमान की

ना उम्र की, ना सीमा की
कभी यूं ही मिल जाए आप सरे राह

ना हो कोई महफ़िल
ना कोई रास्ता हो
मंज़िल भी ना हो कोई
बस तुझी से राब्ता हो

टिका सकूं जहां अपना सर
ऐसा एक ठिकाना हो

लगा सकूं जहां अपना दिल
ऐसा एक फ़साना हो

छोड़कर फ़िक्र सारी, ज़िक्र सारे ,
उलझने ,मुश्किलें, नाराजगी और अनबन

मिल जाए वो मुक़ाम
बैठ जाऊं जहां भूलकर हर काम

हर याद हर ख़्याल हर अदा,
शिकवे शिकायतें और गिला

कुछ ना रहे याद
यही एक छोटी सी इच्छा
यही एक छोटी सी आस


डॉ अलका अरोडा
प्रोफेसर देहरादून
कवियत्री
लेखिका
थिएटर आर्टिस्ट


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6 वर्ष पहले

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