जो तम आज उमड़ कर आया,
तव धीर-प्रतिष्ठा ढहाने को,
वह अंत नहीं, बस काल-चक्र,
तेरी सोनिताग्नि भड़काने को!
क्या हुआ जो ऐसा लगता सब बिखर गया?
आज क्यों तेरा ओजस्वी मन सिहर गया?
तू वज्र-सदृश अविचल, जो सदा निष्कंप रहा,
फिर क्षणभंगुर विपदा से क्यों अब डर गया?
तू महा-वृक्ष इस घराने का,
तू ही तो आधार ज़माने का!
तेरी ये थकी-हताश साँसें,
नींव-स्तंभ को झकझोरेंगी,
तू झुका अगर इस समर-भूमि में,
तो भावी पीढ़ियाँ मुख मोड़ेंगी।
उठ! देख दर्पण में अंश तेरा संग खड़ा,
आशीष से तेरे अंगद-सा पाँव ज़माने को,
वापस ले संग अपने इस बेटे को,
फिर से अखंड वज्र-रूप में आने को!
तू बन फिर जनार्दन, मुझको पार्थ बना,
ज्ञान-दीप्ति से मुझको मार्ग नया दिखा,
इस छोटे से कुचक्र और काल-चक्रव्यूह को,
भेदन का प्रचंड रण-कौशल वापस सिखला!
उठ! फिर हुंकार भर, गांडीव उठा,
छिन्न-भिन्न कर दे इस संताप को,
अपने अदम्य मनोबल के तेज से,
भस्म कर डाल हर दुख-ताप को!
मैं जानता हूँ तुझको ओ मेरे पिता!
तूने जीवन भर कभी न झुकना सीखा है,
तेरी उस अदम्य, अमर हिम्मत को,
उम्र की ढलती साँसें भला क्या तोड़ेंगी!
पोंछ ले इन अश्रुओं को अब, पुनः वापस उठ,
तनकर खड़ा हो, समर में हुंकार भर ही घुस,
चीर दो मिलकर विषम परिस्थितियों के सीने को,
यह विपत्ति कोई अंतिम विराम नहीं,
जिस पिता के संग उसका यह -पुत्र खड़ा,
उस कुल-वंश को ढहना कदापि स्वीकार नहीं!
अब रचेंगे हम वापस नव-विजय का विधान,
तेरी छत्रछाया में चमकेगा कुल का स्वाभिमान,
जब तुम हो मेरे साथ ,अँधेरे छँटेंगे अपने आप ,
भोर फिर मुस्कुराएगी नव गीतो के छंद के साथ,!
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