आहिस्ता आहिस्ता वो अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था
सरिया ईटें मोरंग बालू के उस ढांचे में
धीरे - धीरे, मां- पापा का सपना बड़ा हो रहा था
बच्चों सा अल्हड़पन था उसमें
थोड़ा कच्चा, पर इरादों का पक्का
आसमां की ऊंचाइयों को छूने का लड़कपन था उसमें
सीमेंट, मिट्टी, पानी, बिजली
इन सबको खुद में समेटना था उसे
पर ये वक़्त बेवक्त उसके हाथ से बस यूं ही फिसल जाया करते थे
कभी पाइप से, कभी तार से, तो कभी ईटों की नई नवेली दीवार से
सब नटखट बन, बस उसको सताया करते थे
फिर भी नींव उसकी कभी ना डगमगाई थी
लगी उसमें बहुतों की मेहनत की कमाई थी
जब पहली बार मैंने उसे देखा
उल्टा पुल्टा, बेतरतीब सा था वो
मां उसे देख कर गुस्से से तिलमिलाई
फिर अपने सपने को आकार दे मंद मंद मुस्काई
अधूरा, अव्यवस्थित होकर भी उसने हम सबको पूरा किया था
यूं तो अतीत में बहुत मकानों ने आश्रय दिया
पर इस आश्रय ने हमें हमारा घर दिया था।
आज २१ का होने चला है ये,
है मुझसे थोड़ा ही छोटा
पर सयाना मुझसे बड़ा है ये,
टूटने पर सहारा है तो जीतने पर सराहा भी है,
खुद से मुझको दूर भेज , मेरे सपनों को संवारा भी है
पर दिल में एक संकोच-सा रह गया
सपने तो कुछ पूरे हुए, पर घर कहीं दूर ही ठहर गया,
दो पल के इसके साथ के लिए पूरा साल निकल जाता है
मिलो तो आज भी ये पलकें भिचाएं बाहें फैलाए बुलाता है
कैसे रहते हो उस मकान में ,इसका यही एक सवाल है
हर मकान घर नहीं होता, मेरा वहीं पेचिदा-सा जवाब है
अब कैसे बताऊं इसे
कि इसके साथ देखे सपने उन मकानों में जाकर ही पूरे हुए
भाग्यशाली होते हैं वो
जो एक ही घर में बच्चे से बूढ़े हुए।।
~प्रज्ञा
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