इंजन पर पाॅलिश नये नित्य कर रहे,
इंजन में दूषित इंधन नित्य भर रहे।
उपर-उपर पाॅलिश कर के बाहर खूब चमकाया,
अंदर में है गर्द बहुत पर उसको देख न पाया।
लाख बीमारी लेकर तुम नित्य मर रहे,
इंजन में दूषित इंधन नित्य भर रहे।
जीवन के सुहाने डगर में काॅंटे बोते फिरते,
काँटों से बचने की खातिर जा खाई में गिरते।
खुद की करनी से तुम क्यों नित्य डर रहे?
इंजन में दूषित इंधन नित्य भर रहे।
साँसों की माला है जबतक तबतक ही है काया,
माला अगर जो टूट गई तो बस केवल है माया।
माया खातिर माया पर नित्य मर रहे,
इंजन में दूषित इंधन नित्य भर रहे।
समय का पंछी उड़ गया तो फिर कैसे पकड़ोगे?
यौवन में तुम खूब अकड़ा अब किसपर अकड़ोगे।
जस करनी तस भरनी तुम नित्य भर रहे,
इंजन में दूषित इंधन नित्य भर रहे।
-अजीत कुमार
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