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चुनाव

Election
                
                                                         
                            आती है आवाज़ हर एक गलियारों से
                                                                 
                            
जंग छिड़ी हो जैसे अंधियारों से

मशग़ूल जम्हूरियत फंसी फिर मकड़जाल में
बना रिश्ता ख़ून के धब्बों का दीवारों से

मज़हब की चक्की में पिसता रहा आदमी
क़ायम फ़रमान,हुक्मरान के इशारों से

रोटी, कपड़ा, मकान की दरकार क्या?
दफ़्न हो गया सब कुछ,झूठे वादों के बयारों से

दानिस्ता हमारी भी आदत कुछ ठीक नहीं
वर्ना बच के रहते इन वक़्तफ़रोशी सियारों से

"अजीत " जिधर देखो उधर ख़ुदा नज़र आते हैं
सज गई हैं बस्तियां चांद और सितारों से

अजीत यादव

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8 वर्ष पहले

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