आती है आवाज़ हर एक गलियारों से
जंग छिड़ी हो जैसे अंधियारों से
मशग़ूल जम्हूरियत फंसी फिर मकड़जाल में
बना रिश्ता ख़ून के धब्बों का दीवारों से
मज़हब की चक्की में पिसता रहा आदमी
क़ायम फ़रमान,हुक्मरान के इशारों से
रोटी, कपड़ा, मकान की दरकार क्या?
दफ़्न हो गया सब कुछ,झूठे वादों के बयारों से
दानिस्ता हमारी भी आदत कुछ ठीक नहीं
वर्ना बच के रहते इन वक़्तफ़रोशी सियारों से
"अजीत " जिधर देखो उधर ख़ुदा नज़र आते हैं
सज गई हैं बस्तियां चांद और सितारों से
अजीत यादव
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