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उसका में कुछ भी नहीं

                
                                                         
                            मैं जान कर अंजान था, या नादान था समझा नही
                                                                 
                            
जो है मेरी धड़कन का सबब, उसका मैं कुछ भी नही
 
तेरी बात में कुछ बात थी, कि हम यकीं करते गये
क्या झूठ था क्या सच तेरा, हमने कभी सोचा नही
 
हमें दिल लगाने की चाह थी, तुम्हें खेलने का शौक था
शीशे पे जब पत्थर गिरा, साबुत रहा कुछ भी नही
 
तुमने किए वादे कई, तुम्हें याद हो कि ना याद हो
मैने था एक वादा किया, मैं आज तक भूला नही
 
कभी तुम भी ये जानोगे, मोहब्बत किसको कहते हैं
वक़्त एक दरिया है मगर, ये लौट के आता नही
 
जिसके इंतेज़ार में,... हम..देर तक बैठे रहे
आख़िर हमें आया यकीं, वो आशना अपना नही
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एक घंटा पहले

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