वो जितने भी अपने ग़म-ए-दिल हुए
हर ग़म की ख़ुशी में वो शामिल हुए
जब भी ख़ुशियों का मेरी जनाज़ा उठा
उनकी आँखों से कोई ना आसूं गिरा
वो पाकर के जिनसे मोहब्बत की दौलत
हमें था लगा हमको सब कुछ मिला
अब ना साये भी उनके हैं हासिल हुए
हर ग़म की...
मैं टूटा बहुत ... बेज़ुबां हो गया
हमने चाहा था क्या औ ये क्या हो गया
आग ऐसी लगी इस दिलोजान में
कि जलकर के सीना धुआँ हो गया
यूँ उनसे हैं रुसवा हम पल पल हुए
हर ग़म की...
ये जीवन भी क्या है बस एक सिलसिला है
वो ग़म या ख़ुशी जिसको जो भी मिला है
ये लम्बा सफ़र इसकी मंज़िल कहाँ है
यहाँ .. दरमियाँ .. तो बहुत फ़ासला है
ना जाने कहाँ फिर थे हम मिल गए
हर ग़म की...
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