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शीकवे गिले के बाद शिकायत पे आ गये

Shikwe gile ke bad shikayat pe aa gaye
                
                                                         
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सिकवे गिले के बाद शिकायत पे आ गये
दर्पण दिखा दिया तो अदावत पे आ गये

उस्ताद रह गये हैं निज़ामत के बास्ते
शागिर्द आज-कल के सदारत पे आ गये

धोखे मिले किसी को, किसी को दगा मिली
कुछ झूंठ बच रहे थे हुकूमत पे आ गये

बचपन में खेल और जबानी अयाल में
लाचार हो गये तो ज़ियारत पे आ गये

पेबन्द क्या लगा मेरे कुर्ते की जेब में
सारे अज़ीज़ खुलके बगावत पे आ गये

इस कशमकश में आज भी मुंसिफ़ फरार है
चूहे भी बिल्लियों बकालत पे आ गये

आबिद तमाम उम्र भटकते कहां- कहां
अच्छा हुआ जो राहे-मुहब्बत पे आ गये

इरफ़ान "आबिद" 

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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