मयूर पंख सी मस्त उड़ान है,
मंज़िल भी ऊँची है,
हाँ,
यही मुकाम सही है,
हम अपनी उड़ान जारी रखेंगे।
इस कुहासे के बीचों-बीच,
ज़रा प्रकाश बिखरने दो,
दुल्हन सा रूप धरा धरा ने,
अब बाधाओं को सिमटने दो।
अनमोल विरासत मिली है,
यही प्रकृति का आकाश है,
हमारा कर्त्तव्य है प्रयास करना,
अब पंख फैलने दो!
कदमों को रुकने नहीं दूँगा,
अब मंज़िल की राह है,
कुएँ से भी गहरी आंतरिक शक्ति है,
शीतल जिसका पानी है।
अपनों से कोई अलगाव नहीं,
हम मिलकर पंख फैलाएँगे,
ज़रा भी रुकें नहीं कदम,
इन्हें तेज़ी से चलने दो।
भाग्य का कोई शिल्प-लेख नहीं,
ऐसी कौन सी राह जो मुमकिन नहीं,
फैल जाने दो इन पंखों को,
अभी तो पूरी उड़ान बाकी है।
सूर्य जैसी ओजस्वी तेज़ी हो,
साथ में वैसी ही चमक हो,
विशाल स्वरूप के साथ,
अब कदम आगे बढ़ने दो।
रुकने न पाएँ कदमों की धाराएँ,
हाँ,
हम लक्ष्य के करीब हैं,
मंज़िल के जितने भी रास्ते थे,
सब हमने पार किए हैं।
पथ की संख्या भले ही अनेक हो,
पर सबके अपने-अपने लक्ष्य हैं,
इस ज़िंदगी को सफल बनने दो,
अब मुक्त गगन में उड़ने दो।
बातों से नहीं,
कर्मों से हम विपरीत परिस्थितियों से लड़ना सीखे हैं,
हवाओं में एक नई लहर है,
क्योंकि हमारे कर्म सच्चे हैं।
मुट्ठी में भले ही आज कुछ नहीं,
पर इनमें बुलंद मुकाम भरे पड़े हैं,
गिर भी जाऊँगा तो क्या,
फिर से अपने पंख फैलाऊँगा।
हाँ,
मैं हँसते-हँसते अब इस मस्त गगन में उड़ जाऊँगा,
अब कुछ भी मुश्किल नहीं,
क्योंकि पंख फैलना शुरू हैं।
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