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कितना भार लिए फिर रहे

                
                                                         
                            इतनी धूप निकल चुकी है,
                                                                 
                            
तब भी यह बाहर टहल रहे,
नन्ही सी जान लिए ,
फिर भी उन पर ,
कितना भर लिए फिर रहे हैं ।
हमको देखो हम तो अपने में मगं ,
चार दिवारी के नीचे ,
शांत पड़े हैं ।
यह जो मधुर मय ,
करने वाली आवाज है ,
यह चिड़िया तब भी ,
कितनी दूर का सफर तय कर ,
इतनी चमकदार धूप में अपने दिल को तपा रही है ।
मेरे प्रिय ,
वह भी शायद यही करें ,
लेकिन हमने कभी उनको ,
इतनी भयभीत धूप में ,
बुलाया नहीं ,
क्या ?
वह सुनेंगे हमारी बात ,
क्या ?
करेंगे हमारी बातें सुन पाएंगे।
इन दोनों की आवाज मेरे दिल के लिए बराबर है,
मुझे चिड़िया से ,
अत्यधिक लगाव हो गया है,
उनसे तो बहुत पुराना है,
उनकी बातें और मन से,
हम तो चिड़िया की सहज भाव से प्रेम कर बैठे,
देख कर जब वह ,
चिड़िया ,
आई धूप में सुनहरी आंखों से ,
हमारी ओर देखकर मगन हो जाती ,
हम भी कुछ कहते थे ,
चिड़ियां तुम मधुर हो ,
चिड़िया तुम मधुर हो।
इतनी धूप निकल चुकी है,
तब भी यह बाहर टहल रहे,
नन्ही सी जान लिए ,
फिर भी उन पर ,
कितना भर लिए फिर रहे हैं ।
- अभिषेक गुप्ता
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1 hour ago

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