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घटा और धूप

                
                                                         
                            प्यासा हूँ मैं, तेरी घटा की बूंदों से।
                                                                 
                            
कैसे कहूँ मैं, न जाने कब से हमारी चाह, सूखी है धूप सी।
घटा बन गए हो तुम !
न जाने किस दर्पण में, मैं झाकूँ खुद की मंज़िल में।
स्वयं को पाने की चाह में गहन, महसूस कर रही हूँ, खुद को सुलगते !
न कोई घटा न मैं डूबूँ,
न चारों दिशाओं में परवाह की लहर।
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5 घंटे पहले

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