एक कचोड़ी दो समोसा
हम साथ साथ थे,
इनकी परछाई बन,
कोई,
प्रिय भाई,
हर पल एक ख्वाब के साथ।
एक पिता,
पुत्र,
पुत्री के भविष्य के लिए,
कोहरे में लिपटी हुई,
थकान से चूर,
क्या कहूं,
एक कचोड़ी दो समोसा।
पत्नी के ख्वाब सहेजते,
पायल,
बिंदी के एहसास में,
दुनिया भर बातों से,
जब वो,
चर्चा में चिलचिलाती धूप में,
क्या?
एक कचोड़ी दो समोसा।
भाषा बड़ी सरल है,
हर धूप छांव में ,
बेजान बनकर जो लड़ता रहा,
किसी और की ख्यालों में ,
खुद को ना पहचान सका ,
इन भीड़ की कयामत में ,
फिर भी ,
उन्हें लोग क्या कहेंगे ?
जब वह निकला बाहर ,
खिड़कियों की ओर ,
जगमगाती हुई ,
चांदनी रात में ,
क्या सुना?
एक कचोड़ी दो समोसा।
किसी और की गलती का फंदा,
किसी और को पहना देना ,
यह जायज नहीं ,
पर आवाज उठाना चाहिए ।
बेगुनाहों से ताल्लुक रखने वालों की ,
क्या गलती?
वह अपने हित के लिए ,
आपके लिए लड़ रहे हैं ,
आप खड़े कहीं ओर ,
नारी की आवाज में।
पुरुष,
यह बाहर खड़े होकर ,
आपको साहस दे रहे हैं,
क्या सरल बात है ,
कह देना या उंगली उठा देना ,
किसी को क्या बिताती होगी ,
उनकी क्या ?
आब यह पुरुष क्यों ,
पुरुष एक शब्द नहीं ,
दोनों बंधन बनता है ,
ना भेद रहा स्त्री और पुरुष का शिक्षा का हथियार सदा ,
सबको बराबर रखा है ।
क्या ?
अब भी आप कहेंगे
इस जन्म से लेकर मृत्यु तक के।
करो भरोसा,
महात्मा ज्योतिराव फुले पर,
पहले पुरुष जिन्होंने,
समाज की रूढ़ियों को तोड़कर, सबसे पहले ,
अपनी पत्नी ,
सावित्रीबाई फुले को पढ़ाया।
क्या अब भी गाओगे,
एक कचौड़ी, दो समोसा...
इन मर्दों का क्या भरोसा!
रूढ़ियों की हर ,
ज़ंजीर को तोड़ा,
बेटियों का नाता शिक्षा से जोड़ा।
महापुरुषों पर है पूरा भरोसा नहीं,
क्या अब नहीं गाओगे,
आप लोग,
महापुरुषों पर है पूरा भरोसा,
अभी कहोगे,
एक कचौड़ी, दो समोसा...
इन मर्दों का क्या भरोसा!
- अभिषेक गुप्ता
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