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है तुलसी सा पवित्र, ये देशप्रेम

                
                                                         
                            हां, हुआ प्राप्त तुम्हारा पत्र
                                                                 
                            
सुना युद्ध होने को है,
मै हुआ कुशल, ज़ब पढ़ा
मातृभूमि ने तुम्हे पुकारा है
तो अब सुनलो ये ज-न-पु-का-र,

है पाषाण सा तुम्हारा वक्षस्थल विशाल,
जिसे भला क्या भेद सके कोई
हां चक्रव्यूह की रचना मे,
है अभिमन्यु सा पौरुष तुम मे.

है तुलसी सा पवित्र, ये देशप्रेम

कुछ पंक्तिया दोहराता हु
मस्तक, रक्त धरा से सुशोभित करना |
बन सुदर्शन ,
शत्रुओ का अशुभ स्वप्न बनना |
ज़ब तक हो अन्तिम स्वांस
करना तुमको अथक प्रयास

एक अन्तिम बार दोहराता हु
वीरों का आंचल है,रणभूमि
वीरों का दर्पण है,मातृभूमि

शत्रु ने आज तुम्हें ललकारा है
अपनी आत्महत्या को पुकारा है
ग्रहण करो
प्रहार करो
जब तक ना मातृभूमि सुरक्षित हो
संहार करो
संहार करो
तुम अंतिम स्वान्स तक प्रयास करो

ज़ब वीर रण में लड़ते हैं
तब शत्रु नृत्य करते है

सिंह सी दहाड़ से
वीर के अचूक प्रहार से
आया है अवसर
तुम मातृऋण को चुका जाओ
तुम शौर्य से शत्रुओं को झुक जाओ
हे वीर
तुम मातृभूमि पर लहू से लिखा जाना
है तुलसी सा पवित्र, तुम्हारा ये देश प्रेम
-अभिषेक देव वशिष्ठ
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9 महीने पहले

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