समाज मुझे भूले भी नहीं देता
कि मैं एक औरत हूँ,
उस समाज के लिए जिसे किसी ने कभी उसे अपनाया भी नहीं |
और उसकी गरिमा को कभी जाना भी नहीं
पर हाँ,क्योंकि मैं एक औरत हूँ,
मेरी आज़ादी का मतलब मैं न जा सकूँ
और उसके लिए आवाज़ उठा सकूँ
उसके लिए मुझे कई वर्षों तक अनपढ़ रखा गया|
और कई यातनाओं का व दुखों का सामना करना पड़ा |
पर हाँ,क्योंकि मैं एक औरत हूँ,
मुझे वो सब करना पड़ेगा
जो एक औरत होने के नाते करती है-
सुबह जल्दी उठना
सबके उठने से पहले दूसरों का नाश्ता तैयार करना
सबका ख्याल रखना
सिर पर पल्लू रखना ,कम बोलना,कम हँसना
और ज़्यादा ज्ञान न झड़ना
पूरे कपड़े पहनना और कम सजना-संवरना
ये सब मुझे करना पड़ेगा |
पर हाँ,क्योंकि मैं एक औरत हूँ
ये मुझे अपनी जवानी से लेकर अपने मरते बुढ़ापे तक याद रखना होगा की
मेरी सीमाओं का कितना दायरा है
वो समाज तय करती है
मैं समाज में किस तरह से उठ बैठ सकती हूँ
वो भी समाज तय करेगा |
मेरी अपनी ना कोई ख्वाहिश न कोई सपने,
अपने मन की इच्छाये और अपने मन का कुछ न करना
ये औरत को बचपन से उसके दिमाग़ में बैठा दिया जाता हैं |
कितना कठिन होगा उसका जीवन
इस पुरुष प्रधान संसार में
पर हाँ,क्योंकि मैं एक औरत हूँ!!
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