किस काम की दौलत
सोई हुई सी आँखों में
जब सपनों की परियाँ आती हैं,
दिल के सूने आँगन में
कुछ मीठी खुशियाँ लाती हैं।
पलकों पर कोई ख्वाब ठहरे,
तो चेहरा भी मुस्काता है,
वरना यह दिल गुमसुम सा
बस दुनिया को देखता जाता है।
इस चालबाज़ी वाली दुनिया में
एक कदम किसी अनजान की तरफ बढ़ाओ,
शायद कोई अपना मिल जाए,
एक कदम नफ़रत से दूर हटाओ।
फिर देखना, तीसरे कदम पर
कुछ बातें खुद समझ आ जाएँगी,
दौलत और शोहरत की चमक से
कितनी खुशियाँ छूट जाएँगी।
मेहनत की कमाई से जीना
भला किसे बुरा लगता है,
अपने सपनों को पूरा करना
हर किसी को अच्छा लगता है।
बस इतना याद रखना
पैसों में इतना मत खो जाना,
कि सामने खड़े इंसान को
इंसान ही भूल जाना।
राक्षसों के किस्से तो
बचपन से सुनते आए हैं,
पर लालच के राक्षस ने
कितने अपने दूर भगाए हैं।
नोटों की यह दुनिया भी
अजीब सा खेल दिखाती है,
पहले हाथों को भरती है
फिर दिल को खाली कर जाती है।
किसी की मजबूरी बिकती है,
किसी का दर्द भी बिक जाता है,
इस बीमार सी दुनिया में
इलाज तक का दाम लग जाता है।
मोमबत्ती की मोम तो
पिघलकर फिर जम जाती है,
पर दौलत की आदत इंसान को
कहाँ आसानी से छोड़ पाती है।
एक बार हाथ में आ जाए
तो हाथ उसी में फँस जाता है,
इंसान कमाता ही रहता है
पर सुकून पीछे छूट जाता है।
फिर एक दिन रात आती है,
कमरा चुप हो जाता है,
बहुत कुछ पास होने पर भी
मन जाने क्यों उदास हो जाता है।
तभी किसी भूखे को रोटी देना,
किसी प्यासे को पानी देना,
किसी रोते हुए चेहरे पर
बस थोड़ी सी हँसी दे देना।
शायद यही वो पल होता है
जिसकी कोई कीमत नहीं होती,
जिसे तिजोरी में रखा नहीं जाता,
जिसकी कोई गिनती नहीं होती।
रात को जब आँखें बंद हों
और दिल पर कोई बोझ न हो,
बस इतना सा एहसास हो
कि आज कोई मेरे कारण खुश हुआ हो।
तब नींद भी कुछ अलग आती है,
पलकों पर सुकून उतर आता है,
और दिल चुपके से कहता है,
आज मैंने कुछ कमाया है,
आज मैंने किसी का साथ निभाया है।
तब समझ आता है
दौलत आखिर किस काम की है,
अगर किसी के काम न आए
तो ऐसी अमीरी किस नाम की है।
आखिर में साथ क्या जाता है
न पैसा, न घर, न शोहरत, न नाम,
रह जाती है बस इंसानियत
और किसी के दिल में अपना मुकाम।
शायद असली अमीरी वही है
जिसे खर्च करने से घटती नहीं,
जो किसी के चेहरे पर मुस्कान बनकर
हमेशा के लिए मिटती नहीं।
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