ऐ ख़ुदा देख ज़रा जी रहे हैं तेरे बन्दे करोड़ों कैसे!
भूके प्यासे नंगे गंदी बस्तियों में कीड़े-मकोड़ों जैसे!!
क्या कोई मोल नहीं इन की मेहनत इन के पसीने का?
क्या इन का हक़ नहीं इक ख़ुश-हाल ज़िंदगी जीने का??
ये गुनहगार सही इन्हें अपनी ग़लतियों का भी एहसास नहीं!
मौला ऐसा कौन सा मर्ज़ है जिस की दवा तेरे पास नहीं!
इन के दिल-ओ-ज़मीर को नेकी से रौशन कर दे!
इन्हें ख़ुश-हाल कर दे इन के दामन में भी ख़ुशियाॅं भर दे!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
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