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धनतेरस/दीवाली (दो छंद)

                
                                                         
                            महँगाई के दौर में, धनतेरस का पर्व
                                                                 
                            
चम्मच चार खरीदकर, हुआ बहुत ही गर्व

जलें पटाखे किस तरह, न्यायालय की रोक
त्योहारों पर हिन्दुओं, महज ही रोक-टोक
.
हिन्दुओं की उदारता, करते नहीं विरोध
पी लेते हैं सर्वदा, मन में उपजा क्रोध
.
होली पर पानी नहीं, करना है बर्बाद
केवल हिन्दू ही रखें, त्योहारों पर याद
.
जिम्मेदारी है अगर, पर्यावरण हरेक
तो फिर होना चाहिए, नियम कानून एक
.
दो रुपए लेता कमा, आते ही त्योहार
उन सब दुकानदार की, दीवाली बेकार

- विनय कुमार अवस्थी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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