आ भी जाओ कि ये ज़िंदगी कम है,
तुम नहीं तो हर खुशी कम है।
कुछ नई यादें, कुछ पुरानी यादों का एक गहरा ज़ख्म है,
इन ज़ख्मों को भरने के लिए इस जहाँ में मरहम कम हैं।
ये दिल कहता है भुला दो उन यादों को,
पर पुरानी यादों को भुलाने के लिए नई यादें कम हैं।
इस कदर खोई हुई हूँ मैं, इस यामिनी की रागिनी में,
शायद अब होश में आने के लिए ये रातें कम हैं।
आ भी जाओ कि ये ज़िंदगी कम है।
कोई शिकवा हो तो हमें बताओ, हर कोई कहता है,
पर हक़ीक़त तो ये है, सुनने के लिए सबके पास वक़्त कम है।
दुनिया की इस भीड़ ने खामोश रहने की आदत डालकर,
अब पूछते हैं, क्यों तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहटें कम हैं।
खुल कर रो भी नहीं पाते अपनी हालातों पर,
रोने के लिए इन आँखों में अब अश्क कम हैं।
आ भी जाओ कि ये ज़िंदगी कम है।
ऐसा नहीं कि खुद को संभालते नहीं,
बिखरे ही हैं इस कदर कि अब खुद को समेटने के लिए हिम्मत कम है।
यहाँ तो सब अपने भी हैं, पराए भी हैं,
दोस्त भी हैं, दुश्मन भी हैं,
पर एक तुम बिन ये कायनात कम है।
जीने की एक तमन्ना है, मरने की एक दुआ है,
उलझन में है ये धड़कन,
पर इस अंतस को धड़कने के लिए ये हयात कम है।
आ भी जाओ कि ये ज़िंदगी कम है,
तुम नहीं तो मेरी हर खुशी, हर कामयाबी, हर काबिलियत कम है।
– एकता भानु
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