जो रहता हो सदा मुझमें वही हमराज़ दे मौला ।
जो लगती हो सदा मधुमय वही आवाज़ दे मौला ।
ये पिंजरे में पड़े पंछी कभी वो उड़ नहीं पाते,
जो उड़ता हो सदा नभ में वही परवाज़ दे मौला ।
नाकामी इस कदर फैली युवाओ में नहीं देखी,
जो भर दे दम युवाओ में वही आगाज़ दे मौला ।
ना जाने कब सुनी वो धुन जिसे मन गुनगुनाता था,
जो जचता हो सदा मन को वही अब साज़ दे मौला ।
ये सर पर क्यूँ चढ़ाते है खुदी के लाल को बाबा,
वो बूढ़ा मर रहा घर में न इतना नाज़ दे मौला ।
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