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एक शख़्सियत जिसने मुझे कवि के साथ बेहतर इंसान भी बनाया

रघुवीर सहाय
                
                                                         
                            
मेरे लिए यह कहना मुश्किल है कि मैंने 'दिनमान' के संपादक रघुवीर सहाय को पहले जाना या उनके कवि रूप को। शायद उनके दोनों रूपों से परिचय लगभग एक साथ हुआ। मैं तब कॉलेज में पढ़ता था और पढ़ने- लिखने का शौक़ होने के कारण और पत्र-पत्रिकाओं के साथ 'दिनमान' भी नियमित रूप से पढ़ता था। सच कहूं कि ‘दिनमान‘ से जैसी बौद्धिक–संवेदनात्मक ख़ुराक मुझे तब मिलती थी, उस समय की किसी और पत्रिका से नहीं। उसे सबसे पहले पढ़ने के लिए मैं कॉलेज की लाइब्रेरी पहुंच जाता था और जब तक पढ़ नहीं लेता था, मुझे चैन नहीं आता था, हालांकि उसे पढ़कर भी चैन कहां आता था और जानने-समझने-संवेदित होने की बेचैनी और ज़्यादा बढ़ जाती थी। 

जब तक अज्ञेय और रघुवीर सहाय उसके संपादक रहे, तब तक के 'दिनमान' को मैं आज तक प्रकाशित सभी साप्ताहिकों में हिंदी का सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक मानता हूं, क्योंकि दृष्टि की वैसी व्यापकता, वैसा वैविध्य, विभिन्न कलाओं तथा ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों के लिए जीवंत और अर्थमय भाषा गढ़ने का काम किसी और ने नहीं किया। कला के विभिन्न अनुशासनों में अलग-अलग देशों-क्षत्रों में जो हो रहा है, चल रहा है, समाज की विभिन्न परतों पर क्या-क्या हो रहा है, इसकी पहली बार ठीक-ठीक ख़बर 'दिनमान' ने दी। बाद में यह परंपरा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकले अख़बारों और पत्रिकाओं ने नहीं निभाई।अब तो ज़्यादातर उल्टी ही प्रक्रिया चलती दिखती है। 

कॉलेज के उन्हीं वर्षों में मैंने अज्ञेय द्वारा संपादित रघुवीर जी की कविताओं-कहानियों आदि का संग्रह 'सीढ़ियों पर धूप में' पढ़ा था। मुझे उस संग्रह ने बहुत प्रभावित किया, हालांकि तब तक उनके दूसरे कविता संग्रह आत्महत्या के विरुद्ध की चारों तरफ़ बहुत चर्चा थी लेकिन मेरी राजनीतिक और सामाजिक समझ इतनी विकसित नहीं थी कि मैं उसकी ज़्यादातर कविताओं को समझ पाता।'सीढ़ियों पर धूप में' संग्रह की कई कविताएं मुझे बहुत नई और बहुत अच्छी लगी थीं तब और आज भी लगती हैं। जैसे एक कविता है-अगर कहीं मैं तोता होता। यह कविता ऊपर से शब्दों का एक चमत्कारिक संपुंजन मात्र लगती है, अर्थहीन सी लगती है, रोचक खेल जैसी लगती है लेकिन इस कविता की बुनावट में कुछ ऐसा था कि यह इतनी पसंद आई थी कि रट गई थी। इसी तरह इसी संग्रह में एक और कविता थी-पढ़िए गीता। इसमें ऐसी अनेक श्रेष्ठ कविताएं हैं, किन-किन का यहां नाम लूं।

बहरहाल उनके इस संग्रह का मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा और और 'दिनमान' के संपादन का भी, इसलिए जब 1971 में मैं अचानक दिल्ली आ टपका- यहां जमने के इरादे से तो आते ही सबसे पहले मैं 'दिनमान' के दफ़्तर गया, जहां पहले प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से मिला और फिर उनकी सिफ़ारिश पर रघुवीर सहाय से। वह संपादक थे, एक अलग कमरे में बैठते थे, इसलिए मेरा साहस नहीं हो रहा था कि क़स्बे का एक छोकरा सीधे उनके पास फटकने की हिम्मत करे। जब मैं उनके पास गया तो समझिये मेरे पास पत्रकारिता का लगभग कोई अनुभव नहीं था। 
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''दिनमान' जैसी पत्रिका के संपादक ने मुझ जैसे नाचीज़ को समय दिया'

9 वर्ष पहले

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