प्रभु जी मेरे अवगुन चित्त न धरौ
इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परौ।
पारस भेदभाव नहिं मानत कंचन करत खरौ।
ईश्वर के समक्ष अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए भक्त अक्सर सूरदास के इन पदों को गाते हैं। वही सूरदास जो कृष्ण के अनन्य अनुरागी हैं और जिनके काव्य में अपने इष्ट के लिए विशेष अनुराग नज़र आता है। सूरदास कृष्ण भक्तों की श्रृंखला में अग्रगण्य हैं तो ये भी अवश्यंभावी है कि कृष्ण की नगरी के वासी जो स्वयं भी कृष्ण के उपासक हैं, उनको सूरदास के प्रति लगाव हो। मैं भी मथुरा के उन्हीं लोगों में से एक हूं जिन्हें कृष्ण की उपासना करने का सौभाग्य उनके शहर की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला है और उस उपहार के साथ सूरदास जैसे अन्नय प्रभु-भक्त की कृष्ण संबंधी कथाएं भी मिली हैं।
उनके पदों को पढ़कर कान्हा की बंसी की टेर सुनाई देती है और चूंकि मैं भी एक बृजवासी हूं, मुझे ये टेर और भी गहराई से सुनाई देती है। सूर मथुरा- वृन्दावन की गलियों में घूमे या नहीं और उन्होंने गोवर्धन गिरी की कितनी परिक्रमा कीं, यह सिर्फ किताबों में जानने-पढ़ने को मिलता है लेकिन यह जानना कहीं भी महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि मुझ जैसे साधारण कृष्ण भक्त के लिए उन्होंने अनेक पद लिख दिए हैं जिससे मेरी ईश-श्रृद्दा को और भी प्रगाड़ता मिलती है इसलिए सूर के जन्म संबंधी अनेक मत होेने के बाद भी उन पर बृज क्षेत्र अपना अधिकार सुनिश्चित कर सकता है।
एक भक्त के गुणों का व्याख्यान करने से भगवान को भी प्रसन्नता होती है, ऐसे में सगुण भक्ति के पदचिह्न सूरदास के लिखे का सार कर देने से तो प्रभु अति आह्लादित हो उठेंगे। सूर के पदों में अपने आराध्य के प्रति जितना साख्य भाव नज़र आता है उतना ही दास्य भाव भी है। एक जगह वह लिखते हैं कि
खेलत में को काको गुसैंया
हरि-हारे जीते श्रीदामा बरवस ही कत करत रिसैंया।
यहां कृष्ण के प्रति उनके भक्त का सखा भाव नज़र आता है, "कृष्ण अपने सखा श्रीदामा के साथ खेल रहे हैं और हारने के बाद भी अपनी पराजय को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। "
यहां अपने ह्रदय के दास भाव को प्रकट करते हुए वह लिखते हैं कि
चरन कमल बंदौ हरिराई ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे,अंधे को सब कछु दरसाई ॥
बहरो सुने मूक पुनि बोले,रंक चले सिर छत्र धराई ।
‘सूरदास’ स्वामी करुणामय, बारबार बंदौ तिहिं पाई
"चरण-कमल हरि की मैं वंदना करता हूं जिनकी कृपा से पैरों से अपंग भी पर्वत पार कर सकता है, अंधे को सब कुछ दिखाई दे सकता है, बहरे को सुनाई देने लगता है और गूंगा बोलने लगता है। वह हरि जिनकी कृपा से कोई रंक भी सिर पर छत्र धारण करने योग्य हो जाता है ऐसे करुणामयी हरि के चरणों की सूरदास बार-बार वंदना करता है।"
सूर की भक्ति की कोई परिधि नहीं है, उनके काव्य में साख्य और दास का रस तो है ही साथ ही वात्सल्य भी प्रचुर है, यथा
मैया मैं नहीं माखन खायौ ॥
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ
"मां मैंने माखन नहीं खाया है, ये तो सखाओं ने मेरे मुंह पर लगा दिया है"।
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