'कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर
ख़ून चलता है तो रूकता नहीं संगीनों से'
साहिर लुधियानवी ने इन अल्फ़ाज़ के ज़रिये अपना जो इंकलाबी नज़रिया सात दशक पहले पेश किया था, आज के दौर में भी वो उतना ही मौजूं हैं। सत्ता का चेहरा बदला, विद्रोह के तरीके बदले लेकिन इन शब्दों की मूल आत्मा बरकरार है। आम तौर पर साहिर को उनके उन फिल्मी गीतों के लिए याद किया जाता है जिनमें प्रेम और अलगाव की बेचैनी के साथ साथ अमीरी-गरीबी के फासले के बीच समाज का विद्रूप चेहरा, पूंजीवादी और सामंती सोच की खिलाफ़त, कुछ निराशा और कुछ नई उम्मीद नज़र आती रही है। चाहे वो प्यासा का अमर गीत ‘ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया’हो या फिर खूबसूरत कल की उम्मीदों से भरा ‘वो सुबह कभी तो आएगी’। प्यार की अठखेलियों से भरा ‘जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी’हो या फिर उनका पहला हिट गीत ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आएं’।
दरअसल आज जब हम साहिर पर बात करते हैं तो उनके कई शेड्स की चर्चा ज़रूरी लगती है। हर कलाकार, शायर और गीतकार की ज़िंदगी के तमाम पहलू होते हैं, समाज, रिश्तों और रवायतों को देखने का उसका अपना नज़रिया होता है... जाहिर है साहिर भी अलग नहीं हैं। उनके भीतर का इंकलाबी शायर कई मौकों पर रूमानी हो जाता है लेकिन जिंदगी की जिस जद्दोजहद ने साहिर को साहिर बनाया, वो उनके अल्फाज़ के साथ उनकी शायरी में अक्सर झलकती है। उनके सामाजिक सरोकारों को ज़रा इन पंक्तियों में देखिए –
'धूल उड़ने लगी बाज़ारों में
भूख उगने लगी खलिहानों में
हर चीज़ दुकानों से उठकर
रुपोश हुई तहख़ानों में'
'बदहाल घरों की बदहाली
बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी
महंगाई बढ़कर काल बनी
सारी बस्ती कंगाल बनी'
तरक्कीपसंद शायरों की फेहरिस्त में कैफ़ी आज़मी से लेकर दुष्यंत कुमार तक और फैज़ अहमद फैज़ से लेकर साहिर तक... सबने जो लिखा वो अगली कई पीढ़ियों तक पढ़ा और पसंद किया जाएगा। एक वाकया जिसने साहिर को ताउम्र अकेला रहने और इतने रूमानी खयालात वाला शायर बना देने में अहम किरदार निभाया, वो उनके कॉलेज के दिनों का प्रेम था। लुधियाना में पैदा हुए इस ग़रीब मुसलमान का गुनाह ये था कि उसने लुधियाना के गवर्मेंट कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अमृता प्रीतम से अनायास ही प्रेम कर लिया था। अमृता भी तब साहिर और उनके शेरों की कम दीवानी नहीं थीं।
लेकिन अमृता के रसूखदार पिता ने साहिर को कॉलेज से निकलवा कर ऐसी सज़ा दी कि उनकी ज़िंदगी ने फिर करवट ली। इंकलाब के उस दौर में अपनी शायरी से मशहूर हो रहे साहिर और उनके बेहद करीबी दोस्त कैफ़ी ने अपनी रचनाओं से एक नए सांस्कृतिक आंदोलन को तेज़ किया। लेकिन वो एक्टिविस्ट नहीं थे, शुद्ध रूप से शायर और गीतकार थे। मुंबई पहुंचे। कई पत्रिकाओं का संपादन किया और उस दौर की फिल्मों के लिए गीत लिखने का सिलसिला शुरू कर दिया। लेकिन उनका प्रेम मन में कहीं गहरे दबा रहा और अल्फ़ाजों में बयान होता रहा –
'मुझे यकीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान है कि हम मिलके भी पराये हैं'।
और
'मैं फूल टांक रहा हूं तुम्हारे जूड़े में
तुम्हारी आंख मुसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूं
ज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है'
अमृता प्रीतम बेशक साहिर की नहीं हो सकीं लेकिन वो उनसे बेपनाह मुहब्बत करती रहीं। इमरोज़ के साथ रहते हुए भी और इमरोज़ को चाहते हुए भी। पिता ने जिस प्रीतम सिंह से अमृता की शादी कराई वो कुछ ही समय में टूट गई। लेकिन एक तरफ साहिर तो दूसरी तरफ अमृता दूर रहकर भी एक दूसरे के हमेशा करीब थे। अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में अमृता ने लिखा भी है-वो चुपचाप मेरे कमरे में सिगरेट पिया करता। आधी पीने के बाद सिगरेट बुझा देता और नई सिगरेट सुलगा लेता। जब वो जाता तो कमरे में उसकी पी हुई सिगरेटों की महक बची रहती। मैं उन सिगरेट के बटों को संभाल कर रखतीं और अकेले में उन बटों को दोबारा सुलगाती। जब मैं उन्हें अपनी उंगलियों में पकड़ती तो मुझे लगता कि मैं साहिर के हाथों को छू रही हूं। इस तरह मुझे सिगरेट पीने की लत लगी।
1980 में अपने आखिरी दिनों से पहले तक साहिर लगातार लिखते रहे.. फिल्मी गानों का अपना व्याकरण होता है और उसी व्याकरण के तहत बदलते वक्त के साथ साहिर ने भी खुद को ढालने की कोशिश की लेकिन अंत तक अमृता उनके अहसास में बनी रहीं। ‘कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है के जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए’लिखते हुए भी उनके जहन में अमृता ही थीं।
फिल्मी दुनिया का अपना एक मिज़ाज होता है। जिस दौर में साहिर थे, शैलेन्द्र, कैफ़ी आज़मी, सचिन देव बर्मन सरीखी शख्सियतें थीं और जो लोग आज़ादी के दौर से तपकर, ज़िंदगी को करीब से देखकर और वैचारिक प्रतिबद्धताओं के साथ साहित्य में आए, वो दौर बेशक आज नहीं है। लेकिन अच्छा लिखने और अच्छे गीतों की पूरी पूरी गुंजाइश आज भी है जो बीच बीच में हमें नज़र भी आती है। शायद आज के इस व्यावसायिक और बाजारू दौर में चंद गीतकारों को साहिर इसलिए पसंद भी आते हैं।
खासकर आज के दौर में जब समाज टुकड़ों में बंटा हो, कौम के नाम पर सियासत का खेल चल रहा हो, नई पीढ़ी में नफ़रत भरने की एक सुनियोजित कोशिश चल रही हो, ऐसे में साहिर के उन गीतों को याद करना चाहिए जो उन्होंने 1961 और 1970 में लिखे थे –‘अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम..’ या फिर ‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सनमति दे भगवान... सारा जग तेरी सन्तान’।
उनकी इन पंक्तियों को भी याद करना चाहिए जो किसी शायर को अमर बना देते हैं –
'जिस्म मिट जाने से इन्सान नहीं मर जाते
धड़कनें रूकने से अरमान नहीं मर जाते
सांस थम जाने से ऐलान नहीं मर जाते
होंठ जम जाने से फ़रमान नहीं मर जाते...'
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