साहिर लुधियानवी का जिक्र आते ही उनका यह मशहूर शेर भी साथ ही ज़ेहन में आता है,
दुनिया ने तज्रबातो – हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है, वो लौटा रहा हूँ मैं।
फिर हमारा ध्यान जाता है कि आख़िर वो कौन से हादसे और तजुर्बे थे, जिसने शायर को इस क़दर बेज़ार और तल्ख़ बनाया कि उसने अपने पहले कविता- संग्रह का नाम ही तल्ख़ियाँ रखा। बात शुरू से शुरू करें तो लगता है जैसे उनका जन्म ही हादसा था। 8 मार्च 1921 को जन्मे अपने बेटे का नाम चौधरी मुहम्मद फ़जल ने ‘अब्दुल हई’ इसलिये रखा ताकि अपने बेटे को गालियाँ देकर, उसे अपमानित कर, उसे पीटकर अपनी दुश्मनी की हवस को पूरा कर सके क्योंकि उनके सियासी दुश्मन का नाम ‘अब्दुल हई’ था।
बाप-बेटे के रिश्तों में इस तरह की कायराना हवस और बीमार सोच हैरत में डालती है, लेकिन जब इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान जाता है कि मुहम्मद फज़ल की ग्यारह बीबीयाँ थी और औरतों का वजूद उसकी निगाह में एक जिंस, एक वस्तु, एक जिस्म से ज़्यादा का नहीं तो उसकी हैवानियत पर ज़्यादा आश्चर्य नहीं होता। औरतों के प्रति अपने बाप के इस तंगख़्याल ने ही शायद ‘साहिर’ को औरतों के प्रति ज़्यादा उदार और नेक बनाया। अपनी मशहूर नज़्म ‘चकले’ में हालात के हाथों, बेकसी में अपने आपको बेचती औरत के प्रति साहिर सिर्फ़ संवेदित नहीं होते बल्कि उसको जिस ऊंचाई पर पहुँचाते हैं, वह कहीं और नहीं दिखता -
‘मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत, जुलेख़ा की बेटी
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं?
अमृता प्रीतम ने साहिर के प्रति अपनी चाहत का खुलकर इज़हार किया
साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम
औरतों के प्रति साहिर का यह नज़रिया अपनी माँ ‘सरदार बेग़म’ के प्रति बेपनाह मुहब्बत से पैदा हुआ था। यह वही माँ थी, जो अपने बेटे की ख़ातिर उस ज़ालिम बाप से लड़ पड़ी। उसे लेकर भाग गई, उसकी परवरिश के लिये, उसके हक़ के लिये, उसके हुकूक के लिये उस ज़ालिम से अनवरत लड़ती रही और अपने बेटे को, ‘अब्दुल हई’ को उसके तमाम अतीत से खींच कर पढ़ाया, उसकी परवरिश की और उसे नया नाम दिया- ‘साहिर’। साहिर मतलब 'जादू'। और दुनिया जानती है कि आज तक साहिर के नज़्मों का जादू दुनिया के सिर चढ़कर बोलता है।
‘फिर न कीजे मेरी गुस्ताख़ निगाही का गिला
देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको'
अपने फ़िल्मी गीतों और अमृता प्रीतम व सुधा मल्होत्रा, के साथ अपने इश्क के चर्चों को लेकर ‘साहिर’ की छवि एक रोमैंटिक शायर की बनती है। इसमें कोई शक भी नहीं कि रोमांस जैसे साहिर की रगों में बहता था, उनके दोस्त अहमद राही का तो मानना था कि यदि साहिर अपनी शायरी की तरह ही ख़ूबसूरत भी होता तो लोग रोमैंटिक आंदोलन के मशहूर अंग्रेज़ी के कवि ‘लॉर्ड बायरन’ को भी भूल जाते। लेकिन साहिर अपने मुहब्बत के इक़रार और इज़हार में एकदम ख़ामोश और लगभग सर्द हैं।
दिल तुम्हारी शिद्दत एहसास से वाकिफ़ तो है
अपने एहसासात से दामन छुड़ा सकता नहीं
तुम मेरी होकर भी बेगाना ही पाओगी मुझे
मैं तुम्हारा होके भी तुममें समा सकता नहीं
यहाँ तक कि अमृता प्रीतम ने जब अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ लिखी और साहिर के प्रति अपने लगाव, आकर्षण और दीवानावार चाहत का बेबाक इज़हार किया तब भी साहिर ने उस पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी। खुद अमृता लिखती हैं, "मैनेंअपनी जीवनी ‘रसीदी टिकट’ में अपने मुआशक़े की दास्तान लिखी थी। साहिर ने पढ़ी थी, लेकिन उसके बाद किसी भी मुलाक़ात में ‘रसीदी टिकट’ का ज़िक्र न मेरी ज़बान पर आया न साहिर की ज़बान पर।"
चंद कलिया निशात की चुनकर
मुद्दतों महवे-यास रहता हूँ
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही
तुझ से मिलकर उदास रहता हूँ।
दरअसल शायरी में वह वक़्त तरक़्क़ी पसंद शायरी का था और इक़बाल, फ़ैज़, फिराक़ जैसे नामचीन शायरों ने उर्दू शायरी और उसके मिज़ाज को जिन बुलंदियों तक पहुंचाया था, साहिर के लिए भी उसके असर से बचना मुश्किल था। तभी तो उन्होंने दुनियाभर में प्रेम की अमर निशानी के तौर पर मशहूर ताजमहल को देखने की बिलकुल अलग और बाग़ी नज़र पैदा की,
ये चमन-ज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
साहिर अपनी प्रगतिशीलता में सिर्फ़ बग़ावत या विरोध के पैरोकार नहीं, वे मामले की तह तक जाना चाहते हैं और हुकुमत को आईना दिखाना चाहते हैं,
‘ये शाह राहें इसी वास्ते बनी थी क्या?
कि इनपे देश की जनता सिसक सिसक के मरे
जमीं ने क्या इसी कारण अनाज उगला था
कि नस्ले-आदमो- हव्वा बिलक बिलक के मरे’
आज हर तरफ शताब्दी वर्ष का शोर है। आजादी का 70 वाँ, तो भारत छोड़ो आंदोलन का 75 वाँ साल अपने समूचे शबाब पर है। गांधी के भारत लौटने और चंपारण सत्याग्रह के 100 साल का जश्न तो अपने उरुज पर तो है ही। ऐसे ही जब गांधी शताब्दी का आगाज़ और ग़ालिब शताब्दी की समाप्ति हो रही थी, साहिर ने लिखा था,
"ये जश्न मुबारक हो, पर ये भी सदाक़त है
हम लोग हक़ीक़त के अहसास से आरी हैं
'गांधी' हो की 'ग़ालिब' हो इंसाफ़ की नज़रों में
हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं"
क्योंकि ग़ालिब और गांधी के जुबाँ और उनकी नीयत से ही जब हमें मतलब नहीं, तो उनकी याद का जश्न कैसा? साहिर ने लिखा,
'ग़ालिब' जिसे कहते हैं उर्दू ही का शाइर था
उर्दू पे सितम ढा कर 'ग़ालिब' पे करम क्यूँ है
उससे भी आगे,
"गांधी हो या ग़ालिब हो
दोनों का क्या काम यहाँ
अब के बरस भी क़त्ल हुई
एक की शिक्षा एक की जुबाँ
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ इन्हें अब कर दे दफ़न"
साहिर के सोचने का दायरा बहुत बड़ा है। उन्होंने लेनिन, नेहरू और यहाँ तक की चीनी शायर ‘यांग सू’ के नाम भी नज़्में लिखी हैं, जिन्हें च्यांग काई शेक ने 20 साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी। लेकिन साहिर मूल रूप से वे मानवीय एहसासात और करुणा के शायर हैं, जो किसी का भी ख़ून देखकर सिहर उठता है, ग़मगीन हो जाता है, और बरबस कह उठता है,
"ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मशरिक़ में हो या मग़रिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर"
(लेखक पेशे से प्रोफेसर हैं और हिंदी कहानियों के चर्चित नाम हैं)
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अमृता प्रीतम ने साहिर के प्रति अपनी चाहत का खुलकर इज़हार किया
2 वर्ष पहले
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