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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने ब्रिटिश भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल की नौकरी छोड़ी थी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज
                
                                                         
                            फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जब यह कहते हैं कि ‘मुझसे पहली सी मुहब्‍बत मेरे मेहबूब न मांग’ तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि वह शख़्स कौन है, जो अपनी महबूबा को अपनी मजबूरी बताते हुए कह रहा है, 
                                                                 
                            
 
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्‍या कीजै 
अब भी दिलकश है तेरा हुस्‍न मगर क्‍या कीजै 


क्‍या यह सिर्फ़ फ़ैज अहमद फ़ैज की आवाज़ है? क्‍या यह सिर्फ़ उन्‍हीं का ख़्याल या नज़रिया है? शायद नहीं। यह आवाज़ संभवतः हमारे युगबोध की आवाज़ है, हमारे समय की सच्‍चाईयों और बदलते ज़रुरत की आवाज़ है। यह वह आवाज़ है जो साहित्‍य के मयारों को बदलने की बात करती है, उसके उद्देश्‍यों को बड़ा करके देखने की माँग करती है। लेकिन यह बदलाव इतना अचानक और आक्रामक भी नहीं है कि समूची परम्‍परा से हमारा नाता ही टूट जाए, बल्कि इसमें पुराने के स्‍वीकार के साथ उसे नया करने का इसरार है। 

और भी दुख हैं, ज़माने में मुहब्‍बत के सिवा 
राहतें और भी हैं, वस्‍ल की राहत के सिवा 


रवायत के प्रति रुमान तो इतना कि ग़ालिब और दाग़ के मिसरे भी फ़ैज के यहां मिलते हैं लेकिन वे भी यहाँ आकर अपने नये मायने पाते हैं - 

तुम्हें क्या कहूँ कि क्या है 
शब-ए-ग़म बुरी बला है 
हमें ये भी था ग़नीमत 
जो कोई शुमार होता 
हमें क्या बुरा था मरना 
अगर एक बार होता 


या फिर 

जो गुज़रते थे 'दाग़' पर सदमे 
अब वही कैफ़ियत सभी की है 


यह सभी की कैफ़ियत की सोच ही फैज़ को आवाम  की अवाज़ का शायर बनाती है, जब भी कहीं दमन, शोषण था एकाधिकार का ख़तरा दिखाई देता है, बरबस यह निकल ही आता है- 

बोल, कि लब आजा़द हैं तेरे
बोल, जुबाँ अब तक तेरी है
तेरा, सुतवाँ जिस्‍म है तेरा
बोल, कि जाँ अब तक तेरी है 

ब्रिटिश भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल की नौकरी छोड़ी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज और यासिर अराफातPC: photobucket

फ़ैज की शायरी व्‍यक्तिगत हताशा, इश्‍क़ या उम्‍मीदी की शायरी नहीं है, यह व्‍यापक जनता के मोहभंग की आवाज़ है, जो आज़ादी की सुबह भी यह पूछ सकती है - 

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर 
वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं


आजा़दी और इसके फलसफे को लेकर यह आलोचनात्‍मक रवैया फ़ैज के प्रगतिशील रूझान के कारण ही पैदा हुआ था, यह गौरतलब है कि जब 1936 में सज्‍जाद जहीर, मुल्‍कराज आनंद आदि लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्‍थापना कर रहे थे, तो उसी साल फैज ने भी उसकी एक शाखा पंजाब में स्‍थापित की थी, यह उनके इसी रुझान का सबूत है कि वे कहते हैं - 

निसार मैं तेरी गालियों के ऐ वतन कि जहां
चली है रस्‍म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्‍म ओ जाँ बचा के चले 


फैज़ अहमद फै़ज एक योद्धा शायर हैं। मज़लूमों शोषितों की लड़ाई लड़ने वाले योद्धा ही नहीं बल्कि 1944 से 1947 तक वे  ब्रिटिश भारतीय सेना के भी अंग रहे। सेना में उन्‍हें लेफ्टिनेंट कर्नल का ओहदा हासिल था। लेकिन उनकी लड़ाई के मोर्चे अलग थे। जो आवाम के हक और हकूक की बात करता हो, वह भला किसी का ख़ून बहाने की नौकरी क्‍योंकर करे? 

सजे तो कैसे सजे क़त्ल-ए-आम का मेला 
किसे लुभाएगा मेरे लहू का वावैला 
मेरे नज़ार बदन में लहू ही कितना है 
चराग़ हो कोई रौशन न कोई जाम भरे 


वह तो अपने वतन से भी यह पूछ सकता है कि, 

तुझको कितनों का लहू चाहिये ऐ अर्ज-ए-वतन
जो तिरे आरिज़ –ए-बेरंग को गुलनार करें
कितनी आहों से कलेजा तिरा ठंडा होगा
कितने आँसू तेरो सहराओं को गुलज़ार करें
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ब्रिटिश भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल की नौकरी छोड़ी

9 वर्ष पहले

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