कबीर को हिंदी साहित्य का अवधूत कहा जाता है। उनका अदम्य साहस उन्हें रहस्यवाद के एक शाश्वत स्तंभ की संज्ञा देता है। कबीर विद्रोह से शुरू होते हैं और प्रेम पर मुक्त होते हैं। उनका रहस्यवाद अंत में प्रेम से ही प्रकाशित होता है। जगत में प्रखर पुंज बनकर साहित्यिक आलोक बिखेरता है। अमूमन रहस्यवाद में तीन अवस्थाएं होती हैं। प्रेम, परिचय और मिलन। कबीर के साहित्य में अद्वैत के प्रति प्रेम, उसका परिचय और बाद में उससे मिलकर अनुभूति को महसूस करना ही मुख्य केंद्र रहा है। ईश्वरीय रहस्य को अनुभव करने के बाद उसे मनुष्य के हृदय की परिधि में लाकर मानवीय संवेदना देना कबीर की मुख्य विशेषता रही है।
कबीर भक्त पहले थे बाद में ज्ञानी
कबीर भक्त पहले थे बाद में ज्ञानी। कबीर की अनुभूति अद्वैत की है। उसे रहस्वाद का रूप देना एक घोर साहित्यिक तप है। कबीर ने यह तप किया भी है और इसे भरपूर ढंग से जिया है। कबीर निर्गुण हैं इसलिए उनका भागवत प्रेम रहस्यवाद कहलाया। कबीर ने अपने रहस्यवाद, अद्वैत ज्ञान, प्रेम मूलक शक्ति से ऐसा मिश्रण तैयार किया जो मनुष्य को आंदोलनकारी बनाता है। स्वभाव से व्यवस्था का विद्रोही बनाता है। यह विद्रोह अंत में आपको समर्पण से ही जोड़ता है। यही इसकी सफलता का श्रेय है। कबीर की ऐसी काव्य साधना ने ही मुझे उनका मुरीद बनाया है। मैं तुलसीदास से भी अधिक अंक कबीर को देना चाहूंगा। वजह यह है कि कबीर का साहित्य सभी वर्ग को पसंद आया। वह मुझे तुलसी से ज्यादा विस्तार देते हैं।
कबीर कूता राम का, मोतिया मेरा नाम
गले जेवड़ी राम की, जित ले उत जाई
प्रतीक अंत में कबीर के आध्यात्मिक प्रेम को ही व्यक्त करते हैं
जीवात्मा और परमात्मा को जोड़कर प्रेम का जो प्रकाश स्वरूप उन्होंने स्थापित किया है वह अपने आप में अनोखा है। कबीर ने अपने काव्य में निर्गुण होने के बावजूद भी प्रतीक या रूपक का सुंदर उपयोग किया है। ये प्रतीक अंत में कबीर के आध्यात्मिक प्रेम को ही व्यक्त करते हैं। उनके इस प्रतीक में कहीं भी लौकिक पक्ष नहीं दिखते हैं। गुरु की कृपा से उनके अंदर ईश्वर के लिए अनुराग उत्पन्न होता है। इससे उन्हें ईश्वरीय सत्ता का आभास होता है। ऐसा होने पर कबीर आनंदित हो जाते हैं।
कबीर लिखते हैं-
कबीर बादल प्रेम हम पर बरसा आय
अंतर भीगी आत्मा, हरी भई बनराय
प्रेम में डूबे आदमी को दुनिया प्रेम से सराबोर लगती है
प्रेम में डूबे एक आदमी को पूरी दुनिया प्रेम के रस से सराबोर लगती है। ऐसे आदमी को संसार एक उलझन लगता है। तब ईश्वर की याद से ही आपको राहत मिलती है। कबीर ईश्वर के प्रेम के लिए काफी उत्सुक हैं। वह बहुत लालायित हैं। उनमें ईश्वर की ललक अथाह भरी थी। कबीर तभी तो अपने लिए अलग से नैतिकता की राह निकाल लेते हैं। कबीर ईश्वर का साक्षात्कार होने से पहले विरह व्यथा को अनिवार्य शर्त मानते हैं।
पानी ही ते हिम भया, हिम हू गया बिलाय
कबिरा जो था सोई भया, अब कछु कहा न जाय
विरह का दंश आदमी के अंदर मैं और तेरे का अंतर पाट देता है
विरह का दंश आदमी के अंदर मैं और तेरे का अंतर पाट देता है। मैं तुम में और तुम मैं में समा जाओ और हम बन जाओ। कबीर के प्रेम और रहस्यवाद का यही सार है। कबीर का रहस्यवाद बूंद का समुद्र में समाना और समुद्र का बूंद में समाना जैसा है। इस तरह का मिलन तभी हो पाता है जब मन का भ्रम दूर हो जाता है। कबीर के मन में इस तरह का भ्रम दूर हो गया था। तभी तो वह नैतिक बल पर समाज को ईश्वर की राह में चलने के लिए ललकारते हैं। जात-पात और धर्म संप्रदाय से ऊपर उठकर प्रेम और सद्भावना के रंग में एकाकार होने की अपील करते हैं।
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
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कबीर भक्त पहले थे बाद में ज्ञानी
8 वर्ष पहले
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