'गुनाहों का देवता’ उपन्यास को कॉलेज के दिनों में लगभग हर साहित्य प्रेमी ने अपने तकिए के बगल में रखा होगा। इसके पात्र चंदर और सुधा के बीच पनपते लगाव को हर संजीदा दिल महसूस कर सकता है। इलाहाबाद यानी आज के प्रयागराज की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी एक ख़ूबसूरत कहानी जिसे आप एक ही बार में पूरा पढ़ जाएंगे। सन् 1949 में पहली बार प्रकाशित हुआ यह उपन्यास 2020 तक में भी उतना ही लोकप्रिय है। तथापि इसके लेखक धर्मवीर भारती ने इसे एक अपरिपक्व उपन्यास माना है।
मात्र 23 साल की उम्र में धर्मवीर भारती ने यह कालजयी उपन्यास प्रकाशित कर दिया था। इसके नए संस्करण आने पर उन्होंने लिखा कि
"इस उपन्यास के नये संस्करण पर दो शब्द लिखते समय मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या लिखूं? अधिक-से-अधिक मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता उन सभी पाठकों के प्रति व्यक्त कर सकता हूं जिन्होंने इसकी ‘कलात्मक अपरिपक्वता’ के बावजूद इसको पसन्द किया है। मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है जैसा पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था से प्रार्थना करना, और इस समय भी मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं वह प्रार्थना मन-ही-मन दोहरा रहा हूं, बस।”
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