अमृता प्रीतम के नाम से कोई नावाकिफ़ हो ये नामुमकिन है। कम-अज़-कम अदब के कद्रदान तो नहीं। उनके कलामों ने उन्हें साहित्य के आसमान का एक चमकीला सितारा तय किया है। ऐसा सितारा जिसकी रौशनी से कितनी ही पीढ़ियां रौशन होंगी। उनके कलाम अपने समय के चश्मदीद हैं और वे अब सदियों तक गवाही देंगे।
इसलिए ये फ़क़त एक कोरी रस्म है किसी ख़ास दिन ही अमृता को याद किया जाए। लेखकों के लिए एक दिन मुकर्रर नहीं किया जा सकता, उनका लिखा गया वक़्त और तारीक़ों के परे उनकी याद दिलाता रहता है। बहरहाल दौर रिवाज़ों का है तो हम भी ये रस्म निभाए जाते है कि आज अमृता का जन्मदिन है और आज अगर वह होतीं तो 100 बसंत पूरे कर लेतीं। आज पंजाब की उस लेखिका का जन्मदिन है जिसे ज़ुबान तक़सीम ना कर सकी। भलें उसके लिखे में इसी बंटवारे का ग़म बेहद था।
अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ
कित्थों क़बरां विच्चों बोल
जिसका हिंदी अनुवाद है कि
आज मैं वारिस शाह से कहती हूँ, अपनी क़ब्र से बोल,
और इश्क़ की किताब का कोई नया पन्ना खोल,
पंजाब की एक ही बेटी (हीर) के रोने पर तूने पूरी गाथा लिख डाली थी,
देख, आज पंजाब की लाखों रोती बेटियाँ तुझे बुला रहीं हैं,
उठ! दर्दमंदों को आवाज़ देने वाले!
ये नज़्म बंटवारे की भयावहता को बताती है साथ ही उसके मर्म को भी उकेरती है। इसकी तारीफ़ दोनों मुल्कों में हुई और अमृता को एक संवेदनशील कवयित्री के तौर पर पहचान मिलनी शुरु हो गयी। देश की इसी बंटवारे पर अमृता ने उपन्यास पिंजर भी लिखी थी जिस पर बाद में फ़िल्म भी बनी।
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अमृता ने लिखा कि
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