विश्व संगीत दिवस की शुरुआत फ़ांस से हुई थी और यह धीरे-धीरे पूरे विश्व में मशहूर हो गया। संगीत वही है जिसमें लय हो, इस तर्ज पर कविताएं भी संगीत से कम नहीं होतीं। उनमें लय है, शब्दों के आरोह-अवरोह हैं और गायन भी है। ऐसी ही कुछ चुनिंदा कविताएं जिन्हें पढ़ते वक़्त किसी संगीत की ही अनुभूति होती है।
महादेवी वर्मा
जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार
हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार
ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से
कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान
फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है
मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार
वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है
पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?
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समर शेष है / रामधारी सिंह "दिनकर"
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