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नवरात्रि विशेष: बस मुझे किसी तरह जी लेने दो...

महिला दिवस
                
                                                         
                            उदय प्रकाश हिंदी के उन कवियों में से है जिनके यहां यथार्थ एहसासभर नहीं है। बल्कि उनकी कविताओं में यथार्थ अपने तीखेपन के साथ उपस्थित होकर हमारे समय और समाज की पड़ताल करता है। औरत शब्द को उदय प्रकाश ने भी अन्य साहित्यकारों की तरह गहराई से समझा है। वाणी प्रकाशन की उदय प्रकाश रचित 'पचास कविताएं नयी सदी के लिए चयन' में 'औरतें' शीर्षक की कविता हम अपने पाठकों के लिए काव्य चर्चा के तहत रख रहे हैं।
                                                                 
                            


औरतें...
वह औरत पर्स से खुदरा नोट निकाल कर कंडक्टर से अपने घर
जाने का टिकट ले रही है
उसके साथ अभी ज़रा देर पहले बलात्कार हुआ है

उसी बस में एक दूसरी औरत अपनी जैसी ही लाचार उम्र की दो-तीन औरतों के साथ
प्रोमोशन और महंगाई भत्ते के बारे में
बातें कर रही है
उसके दफ़्तर में आज उसके अधिकारी ने फिर मीमो भेजा है

 

वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई...
वह औरत जो सुहागन बने रहने के लिए रखे हुए है करवा चौथ का निर्जल व्रत
वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई
सोती सोती अचानक चिल्लाती है
एक और औरत बालकनी में आधीरात खड़ी हुई इंतज़ार करती है
अपनी जैसी ही असुरक्षित और बेबस किसी दूसरी औरत के घर से लौटने वाले
अपने शराबी पति का

संदेह, असुरक्षा और डर से घिरी एक औरत अपने पिटने से पहले
बहुत महीन आवाज़ में पूछती है पति से -
कहां खर्च हो गये आपके पर्स में से तनख्वाह के आधे से
ज़्यादा रुपये ?

 
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8 वर्ष पहले

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