राजनीति में नेताओं की आपसी नोंक-झोंक का दौर हमेशा चलता रहता है। जिसमें वह विपक्ष को जवाब देने के लिए तथ्यों और इतिहास का संदर्भ देते हैं। लेकिन कई दफ़ा स्थिति ऐसी भी बन गई जब नेताओं ने बड़े शायरों और कवियों की रचनाओं को पढ़कर अपनी बात शानदार ढंग से रखी। हम आपके लिए कुछ ऐसे दृष्टांत लेकर आए हैं जब जवाब देने के लिए नेताओं ने काव्य का सहारा लिया।
नरेन्द्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी बात को रखने के लिए शायर निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल संसद में पढ़ी।
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो
यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो
कहीं नहीं कोई सूरज, धुआँ धुआँ है फ़िज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो
सुषमा स्वराज
यहां सुषमा स्वराज बशीर बद्र साहब का शेर पढ़ रही हैं।
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
इसके बाद उन्होंने दूसरा शेर पढ़ा
तुम्हें वफ़ा याद नहीं, हमें जफ़ा याद नहीं
ज़िंदगी और मौत के दो ही तो तराने हैं
एक तुम्हें याद नहीं, एक हमें याद नहीं
मनमोहन सिंह
यहां मनमोहन सिंह सुषमा स्वराज की बात का जवाब अल्लामा इक़बाल का यह शेर पढ़कर दे रहे हैं।
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख, मेरा इंतिज़ार देख
अरुण जेटली
यहां अरुण जेटली ने यह काव्य पढ़ा
कश्ती चलाने वालों ने जब हार के दी पतवार हमें
लहर-लहर तूफ़ान मिले और मौज-मौज मझधार हमें
फिर भी दिखाया है हमने और फिर ये दिखा देंगे सबको
इन हालात में आता है दरिया करना पार हमें
सीताराम येचुरी
सीताराम येचुरी ने यहां विनय महाजन की कविता को पढ़ा है।
मंदिर-मस्जिद-गिरजाघर ने बाँट लिया भगवान को
धरती बाँटी, सागर बाँटा मत बाँटो इंसान को
कविता सुनने के लिए यह वीडियो 32 सैकेण्ड के बाद देखें
राहुल गांधी
यहां राहुल गाँधी मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर पढ़ रहे हैं।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है
यह वीडियो एक मिनट के बाद देखें।
अटल बिहारी वाजपेयी
अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं एक कवि हैं, यहां वह अपनी कविता पढ़ रहे हैं।
गीत नहीं गाता हूँ
बेनकाब चेहरे हैं
दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलस्म,
आज सच से भय खाता हूँ
गीत नही गाता हूँ
लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में
मीत नहीं पाता हूँ ।
गीत नहीं गाता हूँ
पीठ मे छुरी सा चाँद
राहु गया रेखा फाँद
मुक्ति के क्षणों में
बार-बार बँध जाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात
प्राची में, अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ
गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
आप यह वीडियो 15 सैकेण्ड के बाद देखें
हेमामालिनी
यहां महिला दिवस पर विभिन्न महिला सांसदों ने कविताएं पढ़ीं।
मल्लिकार्जुन खड़गे
इसी क्रम में एक बार नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बशीर बद्र की शायरी के माध्यम से अपनी बात कही, शेर था
'दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों'
नरेन्द्र मोदी
संसद में जवाबी तंज देते हुए प्रधामंत्री मोदी ने कहा कि काश ! बशीर साहब का जो शेर पढ़ा गया, उस शेर के पहले वाली लाइन को पढ़ लिया गया होता। इसके बाद प्रधानमंत्री ने बशीर साहब के उस शेर को पढ़ा-
'जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता'
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