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जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं...

ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं...
                
                                                         
                            जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं
                                                                 
                            
वही बातों के भी मीठे बहुत हैं
- अख़तर शाहजहाँपुरी

मैं तो ज़हरीले साँपों को अब भी दूध पिलाता हूँ
ये मेरी फ़ितरत है 'अख़्तर' या मेरी नादानी है
- अख़्तर अब्दुर्रशीद

नफ़रतों की नई दीवार उठाते हुए लोग
क्या अजब लोग हैं ज़िंदान बनाते हुए लोग
एहतिमाम सादिक़

तेरे ख़त आज लतीफ़ों की तरह लगते हैं
ख़ूब हँसता हूँ जहाँ लफ़्ज-ए-वफ़ा आता है
- ज़ुबैर अली ताबिश

अपने ज़हरीले दाँत गाड़ ने के लिए
जब वो फनफना कर बाहर आते हैं
- परवेज़ शहरयार
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5 वर्ष पहले

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